गुरुवार, 29 सितंबर 2022

आत्मकथा का अंश (१) / 'डा.शैलेन्द्र श्रीवास्तव

 आत्मकथा की परिभाषा 

                    

     कई दिनों से इस उलझन मे हूँ कि आत्मकथा कहां से शुरू करूँ । मेरा  जन्म हुआ है शहर के रुद्र नगर वाले किराए वाले मकान मे ,जिसे बाबा जगन्नाथ ने पुत्र यानी मेरे  पिता  अम्बिका.प्रसाद  के वकालत करने के लिये था  सन् 19 35 में। इसके पहले  वह  रामकली स्कूल के  मुख्य सड़क के दक्षिण मे स्थित अपने कच्चे मकान मे रहे हैं ।

      कायदे से हमारा स्थायी घर बाबा का बनवाया गांव भिदूरा वाला घर  ही है जिसकी.दूरी शहर से बीस -बाइस कि.मी.है , जिसका स्थायी पता ग्राम भिदूरा , परगना बरोंसा ,तहसील व जिला सुलतान पुर (अवध ) है । पहले हमारा गां व फैजाबाद जिले मे लगता था ।


अथ कथा सुल्तापुर

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     1857 की जनक्रांति को कुचलने केबाद बिट्रिश हुकूमत के निर्देश पर  जिले को नये सिरे से व्यवस्थित करना शुरू किया गया  । 1858-59 में गोमती के दक्षिण किनारे नया शहर बसाया उसे जिले का मुख्यालय भी  बनाया ।पहले इस स्थान पर अंग्रेजी सेना का कैम्प था इसलिये नये बस रहे शहर को लोग कैम्पू कहने लगे ।मिस्टर पार्किंस पहले डिप्टी कमीशनर नियुक्त हुये थे ।

    बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि 1863-70 के मध्य जिला फैजाबाद सुलतानपुर का  प्रथम भूमि बंदोबस्त किया गया ।1869 में जिले का पुर्नगठन किया गया । नये सीमाकंन में मेरा गांव भिदूरा फैजाबाद जिला से हटा कर परगना बरोंसा के अंतर्गत जिला सुलतानपुर मे आ गया । 

       1869 में ही पहली जनगणना हुई तब जिले की की जनसंख्या थी -930231 और सीमा परिवर्तन के बाद आबादी बढकर 10,40227 हो गई ।प्रति वर्ग मील 593 लोग रहते थे । 1891मेंआबादी 10,75851 थीं यानी नाम मात्र की बढत 32 साल में ।आबादी न बढने का कारण जिले में पड़ा 1873 व.1877 मे भयंकर अकाल बताते हैं । 1901 की जनगणना मे आबादी 10,83,904 थी तथा प्रति मील 637 लोग रहते थे । 1903 मे पहला जिला गजेटियर प्रकाशित किया गया जिसमें उपरोक्त आंकड़े दर्ज हैं ।

       गजेटियर के अनुसार जिले में हिंदू आबादी 9,57,912 तथा मुसलमानों की संख्या 1,19,740 थी ।जिले में ब्राह्मण 1,60300,राजपूत 86561 ,वैश्य 22970 ,कायस्थ 12,832 तथा शेष अन्य जाति के लोग थे ।जिले की कृषि भूमि के 76 प्रति शत हिस्से के मालिक राजपूत थे ।उनके पास 1633 मौजे थे  ,मुसलमानों के पास 175, ब्राह्मणों के पास 75 तथा कायस्थो के पास 67 मौजे थे ।शेष अन्य जातियों के पास थी ।जिले  की लगभग पूरी आबादी कृषि आधारित थी ।

    जिला हेड क्वार्टर शहर की आबादी दस हजार से भी कम थी । पर डिस्ट्रिक्ट मुनस्यपैलिटी का दर्जा 1890 में ही मिल गया था । ( 2011की जनगणना के अनुसार  जिले की आबादी 3,797,117 थी ।)।

      भिदूरा कायस्थों का गां व है ।सजरे के अनुसार  कम से कम पाँच  सौ साल से यह गांव कायस्थों से आबाद है ।पुरानी खतौनी से पता चलता है कि यहाँ के कायस्थ फारसी भाषा के अच्छे जानकर थे और  प्रायः राजस्व विभाग में  कानूनगो व पटवारी की नौकरी  करते थे ।।

    हमारी पीढी से चार पीढी पीछे अवदान लाल  वाजिद अली शाह के जमाने  मे इस क्षेत्र के कानूनगो थे । 1856 में लार्ड डलहौजी  ने बिना वाज़िब कारण के अवध का राज्य अंग्रेजी राज्य में मिला लिया जिससे अवध के तालुक्केदारों व आम जनता मे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध  आक्रोश पैदा हुआ जिसकी परिणित 1857 मे जनक्रांति थी ।  जिले के तालुक्केदारों  ( दियरा रियासत छोडंकर )की छोटी बड़ी सैन्य टुकड़ियाँ हसनपुर के नाज़िम मेहँदी हसन के नेतृत्व में शहर के हर रास्ते पर अंग्रेजी सेना से भिड़ी थी ।  लड़ाई में कम्पनी की सेना  से भागे सिपाहियों तथा अमहट के  खानजादों ने 1857 की जनक्रांति मे बढ़चढ कर हिस्सा लिया था । कुछ समय के लिये पूरे जिले  मे शासन सत्ता क्रांति कारियों के हाथ में  आ गई थी ,पर जल्दी ही  अंग्रेजों ने जनक्रांति को दबाने में सफलता पा ली । सुलतानपुर शहर  9 जून ,1857 को अंग्रेजी सत्ता से  मुक्त  हो गया  था । विद्रोही सिपाहियों ने कर्नल फिशर तथा उनके सहायक कैप्टन गिविंग्स को मौत की घाट उतार दिया था  ।इस घटना से घबरा कर लेफ्टिनेंट टुकर भागकर दियरा रियासत मे शरण ली थी  ।फिर वहाँ से बनारस भाग गया । सुलतान पुर अक्तूबर 1958 तक आजाद रह सका । अंग्रेजों ने गोरखा  फौज की मदद से जनक्रां ति को कुचल दिया ।

        1857 की जनक्रांति के समय ग्राम भिदूरा जिला फैजाबाद जिले मे रहा है । अंग्रेजी सेना एक मुठभेड़ भिदूरा के पास सेमरी बाजार मे खपड़ाडीह की सैन्य टुकड़ी से हुई थी.।अंग्रेजी सेना  सेमरी ,पीढी होते हुये ही आजादी के दीवानों सबक सिखाने सुलतानपुर पहुंची थी ।

             जनक्रांति को दबाने बाद विद्रोही तालुक्कदाऱों के साथ दमन नीति अपनायी । उनकी जमीं दारी जब्त कर नीलाम कर वफादार  तालुक्कदाऱों को दिया गया।  1869 में बरोंसा ,इसौली व अल्देमऊ 

सुलतान पुर जिले मे आ जाने पर इसक्षेत्र के तालुक्कदाऱों की जमींदारी का पुर्नवितरण हुआ ।इस कार्य में कानूनगो अवदानलाल  ने  महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

 बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि कानून गो के इलाके मे कुछ विवाद था ।खपड़ाडीह  के तालुक्कदाऱ ,पीढी गांव जो ठाकुरों गां व का माना जाता था , चाहते थे कि पीढी की जमीं दार उनको मिल जाये ।इसके लिये कानूनगो की सिफारिश जरूरी था ।कानूनगो अवदानलाल  अपने घोड़े से लखनऊ जाते हुये रास्ते मे खपड़ाडीह तालुक्कदाऱ( राजा )के यहाँ रुके तो उनका खूब आदर सत्कार किया और पीढी गांव की सिफारिश करने को कहा ।

    बताते हैं कि अवदानलाल ने  लखनऊ पहुँच कर अपनी रिपोर्ट में कहा कि पीढी गांव के ठाकुर स्वयं जमींदार हैं अतः पीढी का  लगान सीधे लिया जाना चाहिए ,उसे किसी तालुक्का के अंतर्गत नहीं दिया जाना चाहिए ।इसप्रकार पीढी गांव की जमीं दारी खपड़ाडीह ताल्लुकेदार को नहीं मिल सका  ।

   अवदानलालक लौटानी में खपड़ाडीह में रात्रि विश्राम किया । ताल्लुकेदार ने अवदानलाल के घोड़े के चारे में जहर मिलवा दिया जिससे सुबह घोड़ा मृत मिला ।बताते हैं यह घोड़ा सात सौ रुपये से कानूनगो ने खरीदा था ।

        इसी के मध्य अवदानलाल.ने अपनी निजी जमींदारी  में विस्तार किया । सात गांवों में जमींदारी बना ली ।ग्राम भिदूरा मे ही  उनके खाते में 52 बीघा जरीबी जमीन दर्ज रही है ।

   हमारे पूर्वजों मे कौन  व्यक्ति सर्वप्रथम भिदूरा गांव मे बसे ,इसे जानने के लिये उपलब्ध सजरे पर नज़र दौड़ाई तो मालूम हुआ कि अवदानलाल से दो पीढी पूर्व हमारे पूर्वज भवानी दीन लाल पहले व्यक्ति थे जो भिदूरा गांव के उत्तर मे यहाँ बसे थे ।इसकारण हम लोग उत्तर पट्टी के कायस्थ  कहे. गये । भवानीदीन लाल किस पद पर यहाँ रहने आये  थे ,यह तो नहीं मालूम ,पर उनके खाते मे भी 52 बीघा जरीबी  भूमि दर्ज है जिसका विभाजन उत्तराधिकारी को  अंश के अनुसार चकबंदी मे चले  मुकदमे आपसी बंटवारे मे मिला है । इस मुकदमे का फैसला चकबंदी न्यायालय में 1998 में हुआ है ।

भवानी दीन लाल के दो पुत्र हुये -गजाधर लाल व अमृतलाल ।

गजाधर लाल के चार पुत्र थे - केशव प्रसाद , हरचरनलाल ,कन्हई लाल , लालता प्रसाद । कन्हई लाल के पुत्र अवदानलाल हमारे बाबा  जगन्नाथ प्रसाद के बाबा( ग्रांड फादर ) थे ।

  अवदानलाल की मृत्यु के पश्चात  बड़े पुत्र केशव प्रसाद  को नवाब से पिता अवदानलाल कानूनगो के स्थान पर नियुक्ति लेना था लेकिन वो  पंडित से यात्रा के लिये शुभ मुहुर्त निकलवाते  रह गये  ,कई दिन तक लखनऊ जाने का अच्छा मुहुर्त.नहीं बना ।

   इसका लाभ उठाकर पास के गंगेव गांव के कायस्थ लखनऊ से अपनी नियुक्ति करवा ली ।इसतरह यह पद हमारे परिवार से निकल गया ।

   अवदानलाल के चारों पुत्र गांव से बाहर जाकर अन्य नौकरी का प्रयास नहीं किया ।सभी बाप दादा की.बनाई जमीं दारी से काम चलाया ।

       अवदानलाल की मृत्यु के पश्चात चारों भाईयों  मे आपसी बँटवारा हुआ ।जमींदारी मे सब संयुक्त रहा  ।भिदूरा व विनवन की आराजी में हिस्सा कसी की गई ।

     मिट्टी खपरैल से बना पुश्तैनी मकान ढहने लगा था इसलिये उसे वैसे छोड़ दिया गया ।उसके पास की जमीन पर अलग अलग घर बनाने के लिये साढे सात लाठा का प्लाट प्रत्येक को मिला जिसपर सभी ने कच्चे पक्के  नये घर खड़े कर लिये ।

     अवदानलाल के तीसरे नम्बर के पुत्र  कन्हई लाल के दो पुत्र जगन्नाथ प्रसाद  व धर्मकिशोर हुये थे ।

    धर्म किशोर बहुत कम उम्र मे बाप बनते ही गुजर  गये ,उनसे केवल एक पुत्र मुकुट बिहारी हुये थे ।पिता की मृत्यु के समय मुकुट बिहारी  दो साल के ही थे ।इसलिये उनके परिवरिश की जिम्मेदारी जगन्नाथ प्रसाद ने उठाया ।

  अवदानलाल.के बाद  बाबा जगन्नाथ प्रसाद कमाऊ पूत निकले । वह परिवार की जिम्मेदारी के साथ जरूरत पड़ने पर खानदान बँट जाने के बाद भी अन्य तीन चाचाओं के परिवार की आर्थिक सहायता देने में कोताही नहीं करते थे ।

     वह अमेठी राज्य मे प्रबंधक थे ।इस पद पर रहते हुये अच्छी कमाई कर लेते थे  ।इसके अलावा आसपास के जरुरत मंद जमींदारों को ब्याज पर पैसा उधार पर.दिया करते थे ।पक्की रजिस्टर्ड लिखा पढी पर.ही रुपया उधार देते थे , पीढी के राजपूतों को बिना गिरवी   केवल  जुबान पर ही उधार दिया करते थे। परंतु ज्यादा तर जमीन गिरवी रख कर.ही उधार दिया करते थे ।ऐसे दस्तावेज आज भी घर में सुरक्षित रखे हैं । कभी कोई समय पर ब्याज नहीं चुका पाता और ब्याज बढता जाता था तो  वह  गिरवी रखे  खेत आदि को बेचने की पेशकश करता तो प्रायः खरीद भी लेते थे ।इसतरह जमींदारी मे और विस्तार हुआ ।कुछ पैसा एक मारवाड़ी सेठ  के साझे में अमेठी में  कपड़े की दूकान खोली ,पर बनिया हिसाब किताब मे गड़बड़ कर काफी पैसा डूबा दिया । 

    बाबा जगन्नाथ ने गांव मे अपने हिस्से की जमीन पर  काफी बड़ा ईटों से पक्का नया  घर बनवाया जिसकी.बाहरी दीवार चौड़ाई मे छहफुटी है ।बताते है कि घर के निर्माण में छह लाख ईंटे लगी है । प्लाट मे थोड़ा गड्ढा था इसलिये नींव काफी नीचें तक है ।सामने. से घर की चौड़ाई लगभग सात लाठा (8.25 इंच का एक लाठा होता है ।)है तथा लम्बाई कुछ इससे अधिक है ।

        जब भूमि तल बन गया और दूसरा तल बनने लगा तो रास्ता का विवाद लेकर  जगन्नाथ के पुत्रों तथा चाचाओं मे झगड़ा होने लगा ।चाचा आमदा फौजदारी हो गये ,भवन निर्माण रुक गया ।दूसरे दिन पुनः लाठी लेकर भिड़ गये ।इसी लाठी भाजने मे  जगन्नाथ के बड़े बेटे ओंकार नाथ से गलती से चाचा के सिर  लाठी चला दी ,वह वहीं गिर पड़े । कोहराम मच गया ।आनन फानन चाचा  को शहर के जिला अस्पताल में भर्ती करवाया गया ।अस्पताल हमारे रुद्रनगर वाले किराए के मकान के सामने ही है ,इसलिये देखभाल इस मकान मे रहकर करने में सुविधा होती । फौजदारी के दिन बाबा अमेठी मे थे । समाचार पाकर अपने परिवार के जो सदस्य गांव मे रह रहे थे ,सभी को शहर बुला लिया । गांव का घर निर्माण स्थगित कर दिया गया । इसप्रकार गांव से हमारा नाता एक बार छूटा तो व  हमेंशा के लिये छूट गया ।बाबा का परिवार रुद्र नगर के मकान में रहने लगा ।

     अस्पताल में भर्ती चाचा का इलाज के दौरान मृत्यु हो गई ।पुलिस ने 302 का मुकदमा दर्ज कर लिया ।ओं कार नाथ महीने तक रिश्ते दारों के छिपते रहे ।अंत में पकड़े गये ।302दफा मे मुकदमा चला ।सात साल की जेल हुई । वह इंजीनियरिंग में डिप्लोमा होल्डर थे ,इस घटना से सब बेकार गया ।जेल से छूटकर आये तो साईकिल की दूकान खोली , पर नहीं चल पाई ,फिर दूसरा धंधा किया वह भी न चल पाया ।अंततः शहर छोड़ कर गां व चले गये ।अपने हिस्से की.कृषि भूमि पर खेती करवाने लगे ।

       उनका छोटा भाई यानी हमारे पिताजी अम्बिका प्रसाद इलाहाबाद विश्व विद्यालय से ला की डिग्री लेकर रुद्र नगर  वाले  मकान से वकालत शुरू किया ।इस दो विस्वा ( लगभग 310 वर्ग फुट) मे बने मकान का मासिक किराया    पांच रुपये था ।बाद  मकान मालिक ने हमलोगों की गैरमौजूदगी मे उसी मकान के तिहाई हिस्से को.  प्रभु दयाल तिवारी वकील को किराये पर दे दिया ।

   अवध मे चल रहे किसान आन्दोलन से सुलतानपुर मे बहुत हलचल थी । महाराष्ट्रीय ब्राह्मण बाबा रामचंद्र की प्रेरणा से  शहर के प्रभावशाली व्यक्ति बाबा रामलाल और बाबू गनपतसहाय  किसान आन्दोलन से जुड़े थे ।

  बाबू गनपतसहाय शहर.के अति प्रतिष्ठित एडवोकेट थे । रिश्ते मे ओंकार नाथ ताऊ के ससुर थे ।बाबू गनपतसहाय के बड़े भाई हेडमास्टर की लड़की ओंकारनाथ से ब्याही थी । उन दिनों मेरे पिताजी बाबू अम्बिका प्रसाद  नये नये वकीलों में थे ।कांग्रेस के.समर्थक थे इसलिये हर.आंदोलन ,धरना के समय.एक रुपया चंदा देने वालों की सूची में शामिल किये गये थे ।

  किसानों को आन्दोलन के दौरान  बार बार शपथ लेना होता था - वे गैरकानूनी टैक्स नहीं देंगे ,बेगार.नहीं करें गे ,पलई ,भूसा ,रसद बाजार भाव पर बेचेंगे, नजराना नहीं दें गे चाहे बेदखल हो जाय  ,बेदखल खेत को कोई दूसरा किसान नहीं लेगा ।वे आन्दोलन मे सदा शांत रहेंगे ।इसप्रकार जगह जगह एकत्र होकर ये चौदह प्रण दोहराते थे । 

      किसानों का यह आन्दोलन सुलतानपुर के अलावा प्रतापगढ़, रायबरेली, फैजाबाद  में काफी तेजी से.चल रहा था । फैजाबाद में किसान आन्दोलन का नेतृत्व आचार्य नरेंद्र देव व महा शय केदारनाथ कर रहे थे । आचार्य नरेन्द्र देव इलाहाबाद में म्योर सेंट्रल कालेज में 1905 से 1912 तक छात्र रहे हैं ।इसी कालेज में.गनपत सहाय बी.ए.में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर झालावार स्वर्ण पदक प्राप्त किया और इसी कारण  मात्र ग्रेजुएट डिग्री पर उसी कालेज में अंग्रेजी प्रवक्ता नियुक्त कर लिये गये थे । पर 1907 में  बाबू गनपत सहाय अपने शिष्यों के साथ गरम दल के नेता बिपिन चन्द्र पाल जो बंगाल से तूफानी दौरे पर इलाहाबाद आये थे , का भव्य स्वागत किया औऱ उनको गाड़ी पर बैठाकर गाड़ी स्वयं शिष्यों के साथ खींचा । इस घटना के कारण वह कालेज से निकाल दिये गये । इसकारण आचार्य नरेंद्र देव बाबू गनपत सहाय का बहुत आदर.करते थे । 1907 में गनपत सहाय सुलतानपुर आकर वकालत करने लगे ।

    1920 मे सुलतानपुर में कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई ।बाबू गनपत सहाय  प्रथम अध्यक्ष व प्र धानमंत्री  रमाकांत सिंह  हुये । किसान जागरण जोर शोर से चल  रहा था । नवम्बर 1920 में एक सार्वजनिक सभा भाले सुलतानी इलाके में हुआ जिसमें कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बाबू गनपत सहाय ,बाबा रामलाल और.नाज़िम शामिल थे ।  भाले सुलतानिय़ों की भारी भीड़ को ललकारते हुये बाबू गनपतसहाय ने.शेर पढ़ा -

   हो खबरदार जिन्होंने यह अजीयत दी है ।

  कुछ तमाशा तो नहीं कौम ने करवट ली है। 

   शेर सुनकर जोर से तालियां बजने लगी कि तभी पुलिस कप्तान सिपाहियों के साथ आ धमके । सिपाहियों ने इनको  गिरफ्तार करना चाहा तो भीड़. उग्र हो उठी । तय हुआ सभा समाप्त कर.शहर.लौटेंगे तब वे स्वयं गिरफ्तारी दे देंगे । 

    सभा समाप्त कर जब तीनों नेता इक्के से वापस लौट रहे थे तो अलीगंज बाजार में गिरफ्तार कर लिये गये ।इससे किसान आन्दोलन और तीव्र गति से चलने लगा । ऐसी ही एक उग्र भीड़ पर मुंशी गंज में 7 जनवरी ,1921 में गोली चली जिससे कुछ लोग घायल हो गये ।कुछ लोग घायल भी हुये।इससेसुलतानपुर ,रायबरेली ,प्रतापगढ़ में आन्दोलन शिथिल पड़ गया ।इसपर  बाबू गनपत सहाय एक दैनिक समाचार पत्र तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर की व्यक्तिगत निन्दा करने के कारण पुनः जेल गये ।

       गांधी जी ने अचानक आन्दोलन स्थगित कर दिया जिससे कई बड़े नेता गांधी जी आलोचना करने लगे ।

      सुलतानपुर के पितामह कहे जाने वाले  बाबू गनपत सहाय प्रारंभ मे लाला लाजपत राय,विपिन चन्द पाल के समर्थक रहे हैं ।अतः उनकी नीति में परिवर्तन के कारण वह भी  स्वराज पार्टी के नेता मदन मोहन मालवीय तथा लाला लाजपत राय के खेमे में आ गये और सरकार को समर्थन देने के कायल.हो गये ।वह 1924 में ही नगरपालिका के अध्यक्ष चुन लिये गये ।

    12 मार्च,1930 को गांधी जी ने नमक कानून तोड़ने के लिये दाण्डी यात्रा शुरू की और 6अप्रेल को समुद्र तट पर नमक कानून तोड़ा ।

      सुलतान पुर में उससमय बाबू गनपत सहाय जिला परिषद के चेयरमैन थे ही ।उनके प्रोत्साहन से गाँव गाँव में फैले प्राइमरी स्कूलों के अध्यापक राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रचार में जुट गये । जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पं.रामलाल तथा महामंत्री रमाकांत सिंह ने 26 जनवरी को.लौहोर कांग्रेस का प्रस्ताव दोहराया । 

    10 जून ,1930 के दिन  स्वामी नारायण देव के नेतृत्व मे सामुहिक रूप में आपार जनसमूह के समक्ष कराह में नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा ।नमक की पुड़िया बनाकर भारी मूल्य पर आम जनता को बेच टपपपटं । इसी साल. गाँधी जी कस्तूरबा गाँधी के.साथ सुलतानपुर आये और  बाबू गनपत सहाय की.कोठी में ठहरे जिन्हें देखने हजारों छात्र एकत्र हो गये । गांधी जी ने उसीदिन जगरामदास धर्मशाला मे मीटिंग की और आन्दोलन जारी रखने का आह्वान किया । शहर में कांग्रेस विदेशी कपड़ों काबहिष्कार तथा शराब की दूकानों पर धरना प्रदर्शन कर रही थी ।

     दिसम्बर,1930  मे  सविनय  अवग्या  आंदोलन,  धरना देना  थम गया क्यों कि गांधी जी इरविन से बातचीत करने को  तैयार हो गये थे । सन् 31 में गांधी -इरविंग पैक्ट हुआ ।समझौते के अनुसार सभी सत्याग्रही जेल से.रिहा कर दिये गये ।


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     बाबा जगन्नाथ प्रसाद अब सुलतानपुर शहर से अमेठी आने जाने लगे । वे अमेठी इस्टेट में  मैनेजर थे।उन्हें गांव से अमेठी जाना मुमकिन नहीं हो.रहा था। इसलिये  इसी मकान में  उनके पुत्र और.मेरे पिताजी  सन् 35  में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से कानून की डिग्री लेकर वकालत करने आ गये ।  

   गांव वाले  में ताऊ ओंकार नाथ तथा चाचा मुकुट बिहारी का  परिवार  रहने लगा।  वे ही गांव की जमीं दारी व  जायदाद की देख भाल  व खेती करवाते  थे । पिताजी के परिवार का कोई सदस्य गाँव में नहीं रहा है।सभी शहर वाले मकान मे रहने लगे  । 1939 में बाबा जगन्नाथ प्रसाद का स्वर्ग वास हो गया । 

   सितम्बर -39 मे विश्व युद्ध छिड़ गया ।बाबू गनपत सहाय  हिंदू महासभा छोड़कर आचार्य नरेंद्र देव.के अनुरोध पर पुनः कांग्रेस में लौट आये ।  बिट्रिश सरकार भारत की ओर से युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी ।इसपर कांग्रेस ने गहरी नाराजगी जाहिर की ।कांग्रेस ने सहयोग देने के कुछ शर्त रखी जिसे सरकार ने नहीं मानी ।इसपर कांग्रेस ने व्यक्ति गत सत्याग्रह शुरू कर दिया । अंग्रेजों के विश्व युद्ध मे फँसे होने का लाभ उठाकर छह अप्रैल 1940 को स्वतंत्रता संग्राम की घोषणा कर दी ।देश भर में झण्डा चढाने.का आन्दोलन चला व्यक्ति गत सत्याग्रह के प्रचार के लिये  जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद से सुलतानपुर आये ।जनता ने तहेदिल से स्वागत किया । सत्याग्रह की घोषणा होते ही धर पकड़ शुरू हो गई ।केवल सदर तहसील से 50 हजार सत्याग्रही गिरफ्तार होकर जेल गये ।बाबू गनपत सहाय, देवकली दीन, सुंदर लाल ,नाजिम अली इसमें शामिल थे ।

  विश्व युद्ध मे हिटलर ने रूस पर आक्रमण कर देने पर व्रिटिश सरकार घबरा गई ।अतः दिसम्बर,41 में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को रिहा कर पुनः बातचीत की पेशकश की ।इसपर कांग्रेस ने 30 दिसम्बर को व्यक्ति गत सत्याग्रह वापस लेने की घोषणा कर दी ।

  1942 के मार्च -अप्रैल में क्रिप्स मिशन भारतविधेयक घोषणा का मसविदा लेकर भारत आया । मसविदा में युद्ध की समाप्ति पर भारत को औपनिवेशिक देने की बात थी ।पर कई विन्दुओं पर कांग्रेस व मुस्लिम लीग असहमत थी ।अतः क्रिप्स मिशन वापस लौट गया । 

  बम्बई अधिवेशन मे 8 अगस्त 1942 को अंग्रेजो भारत छोड़ो का प्रस्ताव पास हुआ । 9 अगस्त को आन्दोलन शुरू हुआ ।

     सुलतानपुर में  भारत छोड़ो आन्दोलन जोर पकड़ रहा था । 9 अगस्त को ही गनपत सहाय सहित कई नेता गिरफ्तार कर.लिये गये ।

चौक के  सेठ परिवार के  त्रिभुवन सण्डा बताते हैं उन्होंने भी स्व प्रेरित होकर पहली बार टेलीफोन के.तार काटे थे । 

  यह आन्दोलन दिसम्बर ,42 तक दबा दिया गया था ।

  5 जुलाई ,1945 में पहली बार लेबर पार्टी की सरकार आई ।वह भारत को आजादी देने की बात पर ही सत्ता में आई थी ।अतः उसने बात आगे बढा ने के लिये कैविनेट मिशन को भारत भेजा ।य मिशन भारत आकर 472 नेताओं से बातचीत कर वापस चला गया ।16 मई ,1946 को अपना निर्णय दिया । कैविनेट योजना में कई खामियां थीं ।सर्वप्रथम देसी रियासतो की स्थिति स्पष्ट नहीं थी कि सारी शक्ति भारतीयों को सौंपने के बाद वे किसके अंतर्गत. रहेंगे ।योजना में पाकिस्तान की योजना खटाई मे पड़ जाने से  मि.जिन्ना असंतुष्ट थे ।

        पिता जी  अब छह दिन कचेहरी जाते थे ।और हर शनिवार शाम को विन्दवन गांव पाही  जाते औऱ सोमवार  को  22 कि.मी.साईकिल चला कर सुबह घर आते थे ।विन्दवन की जमींदारी के अपने हिस्से कृषि वही करवाते थे ।वैसे खेती व आम के बाग की देख रेख एक कुर्मी परिवार पाही में स्थायी। रूप से रहता था ।

   मेरे पिता जी दो शादी हुई थी ।पहली पत्नी से दो पुत्र -संकठा प्रसाद ,माता प्रसाद  तथा एक पुत्री सावित्री देवी थी ।पहली पत्नी की मृत्यु हो जाने पर दूसरी शादी शायद 1941-42 मे हुई थी ।दूसरी पत्नी से दो पुत्र  बृजेंद्र श्रीवास्तव ,जन्म 10 अक्तूबर 1943 तथा मेरा यानी शैलेंद्र श्रीवास्तव का जन्म 20जुलाई ,1945 है ।इसके बाद.पांव पुत्री के बाद फिर एक पुत्र का जन्म हुआ किन्तु ढाई साल मे लीवर बढ जाने से मृत्यु हो गई ।उसके बाद.फिर दो पुत्री हुई ।इसतरह से दूसरी पत्नी से तीन पुत्र सात पुत्री हुई । रीता 12 साल की उम्र में मृत्यु हो गई थी ,वह आँठवीं कक्षा मे पढ रही थी ।

      कैबिनेट मिशन लौटने के बाद सत्ता हस्तरण के लार्ड माउंट बेटन आये  । माउंट बेटन ने पहला प्रस्ताव नेहरू के सामने यूनाइटेड इंडिया का रखा जिसपर नेहरू बोले ,इसे तो जिन्ना भी नहीं मानेंगे ।

    इसपर माउंट बेटन ने " डिवाडेड इंडिया " की घोषणा कर दी ।इसके अनुसार पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश होगा । देसी रियासतों के बारे मे यह व्यवस्था थी उसके शासक अपना स्वतंत्र निर्णय लेंगे कि वह भारत या पाकिस्तान में से किसी एक मे अपनी रियासत को.मिला सकते हैं।अथवा चाहे तो सीधे ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वतंत्र इकाई के रूप में रह सकते हैं । इस योजना के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ,1947 ब्रिटिश संंसद मे पास हुआ जिसके अनुसार 15 अगस्त 47  को भारत और.पाकिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र बन गये । इस प्रकार लम्बी लडाई के बाद 15 अगस्त सन्.47 को.देश आजाद हुआ ।

       उस समय मेरी उम्र मात्र दो वर्ष थी ,आजादी का अर्थ नहीं जानता था ।पर बड़े भैया के साथ सड़क से गुजरतीं स्कूली झांकियां उत्सुक नजरों से देखना अच्छा लगा था ।बहुत बाद में झांकियो के बारे जान पाया कि झांकी मे खादी वस्त्र में आजादी के हीरो हैं ।

   बड़े भाई बृजेंद्र हमसें पहले स्कूल मे जा रहे थे  जबकि उसके दो साल बाद. मुझे भी 

चार साल की उम्र में सुभाष प्राथमिक पाठशाला मे 20 जुलाई ,48 को पिताजी ने  कक्षा एक मे दाखिल करा दिया । पांच साल की उम्र मे कक्षा दो का  विद्यार्थी था कि एक शाम मैं अपनी छोटी बहन के सं ग सड़क पर मस्ती करते रामलीला देखने जा रहा था कि अचानक सामने से  आ रहे  इक्के के चपेट में आ गये ।

   इक्के का पहिया मेरे दायें हाथ के ऊपर गुजर गया था जिस कारण दर्द से मैं जोर जोर से रोने लगा था ।लोग जमा हो गये ।औऱ सब इक्के वाले को पीटने लगे थे।वह हाथ जोड़ कर कहना चाह रहा था कि उसने बच्चे को बचाने की बहुत कोशिश की पर बच्चे उछल कूद रहे थे ।

        हम द़ोनों को तुरंत अस्पताल लाया गया ।डाक्टर ने चेक करके बताया कि मेरे दायें हाथ की  हड्डी टूट गई है ,इसपर पलास्टर चढाना होगा जबकि बहन को मामुली चोट आई  थी ।

      अम्मा बाबू बहन सब अस्पताल के बरामदे में  खड़े सब कुछ ठीक होने की ईश्वर से मन   ही मन प्रार्थना कर रहे थे ।

       डाक्टर के मुख से पलास्टर चढाने की बात निकली तो पास खड़ा इक्के वाला बोला," डाक्टर साहब आप पलास्टर चढाइये ,जो खर्च आयेगा मैं भुगतान करूंगा ।"

        उन दिनों अस्पताल बदनाम नहीं हुये थे । हर तरह का इलाज मुफ्त होता था । 

   डाक्टर बोला,"कोई बाहर.से  पलास्टर नहीं आना है ।सब अस्पताल में है ।"

     डाक्टर ने  एक घंटे में पलास्टर चढाकर मुझे खड़ा कर दिया ।बोले," दो महीने यह बंधा रहेगा ।उसके बाद पलास्टर काटकर देखा जायेगा ।"

 पलास्टर चढ़ जाने से मेरा         स्कूल जाना छूट गया था ।दाँया  हाथ आधा लटकाये मुहल्ले में बच्चों संग खेल करता था ।बायें हाथ से  पतंग उड़ाता था ।

        दो महीने बाद पिताजी मुझे लेकर अस्पताल आये तो वहाँ इक्के वाला भी मौजूद था ।

        डाक्टर साहब पलास्टर काटते हुये कह रहे थे कि हड्डी ठीक से नहीं बैठी होगी तो पलास्टर दोबारा चढाना होगा ,इसके लिए सोलह रुपये खर्च आयेगा ।

   इक्केवाला तुरंत भुगतान भरने की हामी भरी ।पर डाक्टर ने चेक करके कहा ,"हड्डी ठीक बैठ गई है ।दोबारा नहीं चढाना पड़ेगा ।"

      दो महीने खेलकूद में इतना मस्त रहा कि पढा लिखा सब भूल गया था ।

  पिताजी मुझे लेकर पुन : उसी स्कूल मे पहुंचे ।

   मास्टर ने दो तीन सवाल किए जिसका ठीक जवाब मैं नहीं दे सका था ।

    मास्टर ने कहा ,इसको फिर दर्जा एक मे भर्ती करना होगा ।औऱ पिता जी ने मुझे कक्षा एक में दाखिला करा दिया  था । 

   फिर तख्ती कलम लेकर मैंने स्कूल जाना शुरू कर दिया था ।  स्कूल में  मैं.रोज सेंठा कलम से तख्ती पर  किताब के पृष्ठ की नकल उतारता रहता था । तख्ती भर जाने पर स्कूल प्रांगण में  बने हौद के पानी में तख्ती धोकर साफ करता  था ।

   दर्जा दो पास करने के बाद  छह महीने दर्जा तीन मे पढा ।फिर मास्टर ने दर्जा चार  में  बैठा दिया था ।दर्जा  चार में  अच्छा रिजल्ट देखते हुये कक्षा छह में  एडमिशन के लिये टीसी दे दिया था ।.पाँचवे की परीक्षा से बच गया था ।

  डा०शैलेन्द्र श्रीवास्तव  /लखनऊ

  मो. 7021249526

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