शनिवार, 8 जनवरी 2022

मुल्ला नसरुद्दीन - ओशो

 मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन बहुत नाराज हो गया। किसी बात पर पत्नी से झंझट हो गई थी। गुस्से में एकदम बोला कि इस घर को आग लगा दूंगा। उसका छोटा बेटा जो कोने में बैठा था, वह हंसने लगा। मुल्ला को और क्रोध आया। उसने कहा : तू क्यों हंस रहा है? उल्लू के पट्ठे, तू क्यों हंस रहा है?


तो उसने कहा : मैं इसलिए हंस रहा हूं कि आपसे चूल्हा तो जलता नहीं, घर में आग लगाने चले! असल में चूल्हा नहीं जलता उसी के झगड़े से तो आप घर में आग लगाने की बात कर रहे हैं। चूल्हा जलाने को पत्नी ने कहा था, वह नहीं जला, उसी पर झगड़ा बढ़ा। अब आप कह रहे हैं : घर में आग लगा दूंगा! देखें! इसलिए मुझे हंसी आ गई।


अगर लकड़ी बहुत गीली हो तो आग तो पैदा होगी ही नहीं, धुआं ही धुआं पैदा होगा। लकड़ी जितनी सूखी हो उतना कम धुआं पैदा होता है। और लकड़ी अगर बिल्कुल सूखी हो तो धुआं पैदा ही नहीं होता, निर्धूम अग्नि जलती है। इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ लकड़ी से धुआं पैदा नहीं होता, लकड़ी में जो पानी पड़ा है, उससे धुआं पैदा होता है। धुआं पानी से पैदा होता है, लकड़ी से पैदा नहीं होता। भूलकर भी मत सोचना कि लकड़ी से धुआं पैदा होता है। आग से धुआं पैदा नहीं होता, धुआं पैदा होता है गीलेपन से, आर्द्रता से।


मनुष्य का जो प्रेम है वह गीली लकड़ी जैसा है। उसमें प्रेम भी है और उसमें घृणा भी है। और इसलिए बहुत धुआं पैदा होता है। आग तो जलती कहां——धुआं ही धुआं होता है। प्रेम के नाम से भी आग कहां जलती है? आग ही जल जाए तो तुम कुंदन हो जाओ। धुआं ही धुआं पैदा होता है, आंखें खराब हो जाती हैं।


ज़रा प्रेमियों को तो देखो : लड़ते—झगड़ते ज्यादा हैं, प्रेम वगैरह कहां! धीरे—धीरे उसी लड़ने—झगड़ने को प्रेम समझने लगते हैं। फिर किसी दिन वह लड़ना—झगड़ना न हो तो खाली—खालीपन लगता है, तलब पैदा होती है। पत्नी मायके चली जाए तो एक—दो दिन अच्छा लगता है, फिर तलब पैदा होती है। तलब किस बात की? तलब इस बात की कि कोई झगड़ा न कोई झांसा। घर में बैठे हैं बुद्धू की तरह। 


ओशो

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