सोमवार, 1 नवंबर 2021

डॉ लोहिया औऱ चित्रकूट का रामायण मेला / टिल्लन रिछारिया


डॉ राम मनोहर लोहिया द्वारा संकल्पित चित्रकूट का रामायण मेला ।...रामायण मेला के आयोजन की परिकल्पना डॉ राममनोहर लोहिया ने सन् 1961 में की थी। उसी के तहत 1973 में पहली बार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने चित्रकूट में रामायण मेला आयोजित किया था । इस आयोजन में नगरपालिका चित्रकूटधाम, कर्वी की बड़ी भूमिका थी । नगरपालिका जे अध्यक्ष गोपाल कृष्ण करवरिया और रामायण मेला के संयोजक आचार्य बाबूलाल गर्ग की बड़ी सक्रिय भूमिका थी ।... 1973 में मानस की रचना के 400 वर्ष पूरे होने पर ’मानस चतुर्थशती समारोह’ के रूप में इस मेले को साकार रूप दिया गया था। इस आयोजन को अपने अस्तित्व में आने मे  12  साल का समय लगा । ...इस अरसे में  पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बलदेव प्रसाद गुप्त और बाद के दौर में  बाबूलाल गर्ग  की सतत साधना रही । जब जब लोहिया जी चित्रकूट तब बलदेव प्रसाद गुप्त ही उनके आवभगत की भूमिका में आगे आगे रहते । लोहिया जी के साथ कभी राज नारायण भी रहते ।...बलदेव प्रसाद गुप्ता जी के सौजन्य से उस समय का एक चित्र हमें प्रप्त हुआ ।...लोहिया जी रामायण मेला की तैयारियों को ले के एक मीटिंग के लिए कर्वी आये थे , उनके साथ राजनारायण भी थे । सब की सामूहिक फोटोग्राफी का विचार बना ।फोटोग्राफर आगये , अब राज नारायण जी परेशान , मेरे तो कपड़े धुलने गए हैं , में क्या करूं ।... लोहिया जी बोले , यही बिस्तर की चादर ओढ़ के बैठ जाओ । यही हुआ । यह चित्र बलदेव प्रसाद जी के पास मैंने देखा । मैनी कहा यह महत्वपूर्ण चित्र आप के खजाने में ही रखा रह जायेगा दुनिया जहान इसे देखने से वंचित रह जायेगी । 

इसे सार्वजनिक होना चाहिए । बोले मैं तुम्हारी चतुराई समझता हूँ , ले जाओ और दो घंटे में इसकी कॉपी करा  के वापस करना , गर्ग जी को भी दे आना , वो रामायण मेला की स्मारिका में इसे छप सकते हैं । मैं तुम्हारी भावना समझता हूँ । फोटो मिला, उसकी चार पांच कॉपी निकलवा लीं । यह फोटो रामायण मेला की स्मारिका में भी प्रकाशित है ।

 1973 से शुरू हुए इस मेले  को दो साल बाद पूरे 50 साल हो जाएंगे ।... यह मेला रामलीला के बाद मेरे जीवन की अनुपम पाठशाला रही । आचार्य बाबूलाल गर्ग का अनुभजन्य सानिध्य मिला , उनके साथ रह कर जाना कि ऐसे बड़े आयोजन  कितनी सक्रिय और सतत साधना के के पायों पर खड़े होते हैं । गर्ग जी लगभग इससे सम्बधित हर पत्राचार दिखाते । वे मुझे साहित्य सम्मेलन प्रयाग भेजा करते । बाबूलाल गर्ग जी जे सम्पादन में एक पुस्तक ' तुलसी परिशीलन '  आयी । इसमें बड़े सारगर्भित लेख संकलित थे ।

फादर कामिल बुल्के सहित , कवि केदारनाथ अग्रवाल और वुष्णुकांत शास्त्री सहित देश विदेश के तमाम राम कथा मर्मज्ञ इसमें शामिल थे । इस पुस्तक ने मेरे ज्ञान और समझ का भरपूर विस्तार किया ।...रामायण मेला अपनी शुरुआता से ही आमने भव्य आयोजन के लिए सुर्खियों मे आ गया । ..

.सुबह के सत्र में साधु संतों के भक्तिभाव भरे प्रवचन होते , दोपहर बाद के सत्र में वैचारिक व्याख्यान , रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम शास्त्रीय नृत्य आदि । आयोजन स्थल पर रामकथा पर आधारित चित्रों की प्रदर्शनी भी लगती । उस समय की शायद ही कोई प्रसिद्ध नृत्यांगना हो इस आयोजन में न आई हों ...सोनाल मान सिंह , स्वप्न सुंदरी , शोभना नारायण, कविता श्रीधरानी कुन नही आया  । शर्मा बंधुओं का गायन एक अलग तरह का वातावरण पैदा करता है ।

 उज्जैन निवासी गोपाल शर्मा, सुखदेव शर्मा, कौशलेन्द्र शर्मा और राघवेन्द्र शर्मा ये चारों भाई शर्मा बन्धु के नाम से जाने जाते हैं।भजन गायकी में एक नया ट्रेंड स्थापित करने का श्रेय इन्हीं भाईयों को जाता है। चारों मिलकर जब कोई भजन गाते हैं तो भक्ति भाव का बेहद अदभुत वातावरण बन जाता है। शर्मा बंधुओं की निर्झर कल-कल बहती अमृत वाणी सुनना अविस्मर्णीय अनुभव है ।

आनन्द, प्रेम और शान्ति के आह्वान के मुख्य प्रयोजन के साथ राममनोहर लोहिया ने रामायण मेला आयोजित करने की संकल्पना की थी। उन्हें लगता था कि आयोजन से भारत की एकता जैसे लक्ष्य भी प्राप्त किए जाएँगे। लोहिया मानते थे कि कम्बन की तमिल रामायण, एकनाथ की मराठी रामायण, कृत्तिबास की बंगला रामायण और ऐसी ही दूसरी रामायणों ने अपनी-अपनी भाषा को जन्म और संस्कार दिया। उनका विचार था कि रामायण मेला में तुलसी की रामायण को केन्द्रित करके इन सभी रामायणों पर विचार किया जाएगा और बानगी के तौर पर उसका पाठ भी होगा। लोहिया का निजी मत था कि तुलसी एक रक्षक कवि थे। ...डॉ लोहिया जवाहर लाल नेहरू को भी रामायण मेला में लाना चाहते थे । लेकिन साधारण नागरिक के रूप में , प्रधान मंत्री की हैसियत से नहीं ।...चित्रकूट की कोलकाता वाली धर्मशाला में रामायण मेले का कार्यालय स्थापित हुआ । आयोजन की परिकल्पना इसी चित्रकूट से प्रेरित होकर की गई । डॉ लोहिया ने कहा कि चित्रकूट के रामायण मेले की बात सोचते समय मेरे दिमाग में कई बातें आई यह क्षेत्र निर्धन है। 

हर मामले में पिछड़ा है यहां की सांस्कृतिक चेतना भी अर्ध विकसित है मैंने सोचा रामायण मेले से जहां देश में एकता की लहर दौड़ेगी एशियाई क्षेत्रों से हमारे संबंध मधुर होंगे और उन देशों की जनता के बीच भ्रातत्व की भावना जगेगी , वही चित्रकूट की समस्याएं भी सुधरें सुधरेगी सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट होगा।...गांधी जी ने रामराज्य की परिकल्पना की थी मैं रामायण मेला से सीता राम राज की आवाज बुलंद करने की सोचता हूं । चित्रकूट से बढ़कर और कोई स्थान इसके लिए उपयुक्त नहीं होगा । रामायण मेला परंपरागत मेलों से अलग होगा जिसका उद्देश्य होगा आनंद , दृष्टिबोध , रस संचार तथा हिंदुस्तानी को  बढ़ावा । रामायण उत्तर और दक्षिण की एकता का ग्रंथ है और राम हिंदुस्तान के उत्तर दक्षिण एकता के प्रमुख देवता हैं । राम के जैसा मर्यादित जीवन कहीं नहीं , ना इतिहास में ना कल्पना में ।


रामायण मेला भारत की संस्कृति का सबसे बड़ा मेला होगा। ...रामायण मेले की शुरुआत  के आयोजन , सांस्कृतिक शुचिता , राजनीत से मुक्त और भारतीयता के उच्चादर्शों के मानक स्थापित करने वाले रहे । .. पांच दिवसीय आयोजन वाले इस मेले  के पांचवें आयोजन में  1978 में प्रधानमंत्री मोरार देसाई का आगमन हुआ । अध्यक्षता सुश्री महादेवी वर्मा जी ने की । राजनारायण भी आये , पर्यटन मंत्री पुरुषोत्तम कौशिक  और अन्य मंत्री भी साथ आये । जहां राजनीति अपनी प्रभुता के साथ आती है तो अफरातफरी भी साथ लाती है । हुआ यह कि कुछ वरिष्ठ साहित्यकार मंच तकन  पहुंच पाए । दूसरे दिन से अखबारों में साहित्यकारों  के अवमानना की खबरें छपने लगी । इसी साल रामायण मेला में लोहिया जी के साथ रहे और इस समय राजनारायण के सचिव की भूमिका में कार्यरत विनय कुमार मिश्र रामायण मेला में सक्रिय हुए थे । विनय मिश्र इसी क्षेत्र से हैं । इस अफरातफरी का बवाल उन्हीं पर टूटा । सालों अखबार खिंचाई करते रहे । ...दूसरे दिन के अखबार आये तो विस्तार से फोटो के साथ खबर मेरे  भी अखबार अमृत प्रभात भी छपी । ...यार ये शाम के कार्यक्रम की खबर फोटो सहित आपके अखबार में कैसे छप गई । मैने कहा कि मैं रोडवेज की बस के कंडक्टर को एक रुपये जे साथ खबर का लिफाफा देता हूँ , वह आफिस तक दे आता है ।...शाम को पर्यटक आवास में डॉ रामकुमार वर्मा जी के साथ एकांत मिला तो मैंने कहा कि लोहिया जी इसी लिए मेला किये थे कि साहित्यकार और रामकथा मर्मज्ञ  नीचे रह जाएं और मंच पर राजनीति चढ़ी रहे ।...अरे भाई यह तो आपके सोच का नतीजा है कि आपके लिए साहित्य और रामकथा  बड़ी है कि राजनीति । ...मैंने कहा कि थोड़ा छपने के लिहाज से अपने को व्यक्त कीजिये ।.. कहां भेजेंगे । वहीं जहां के संपादक जी बिना पूर्वानुमति के इंटरव्यू भेजने को मना करते है ।...भेजिए , जरूर छपेगा । मैने कहा देखते है कि संपादक जी का क्या निर्णय रहता है । संक्षिप्त इंटरव्यू था छपा ।...मेले में अपने चित्रोँ की प्रदर्शनी ले जर नागपुर के चित्रकार दशरथ चंदेल आये थे । अपना एक चित्र दिखाते हुए बोले , देखिए ये अमूर्तन कला हमारे परिवेश की है ... बिनु पग चेले सुने बिनु कान / कर बिनु कर्म करे बिधि नाना ...जब हम  बनायेंगें तो कुछ ऐसा ही तो बनेगा । उनका बनाया चित्र सामने था ।...

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