रविवार, 7 नवंबर 2021

कविता हैं सत्तत काल यात्री

 है सतत कालयात्री

- डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

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कविता साहित्य की वह विधा है जो व्यक्ति को ऐंद्रिक अनुभवों की प्रतीति के साथ साथ अतींद्रिय लोकों की यात्रा पर भी ले जाने की क्षमता रखती है। वे गुह्य-गोपन लोक जहाँ रवि भी नहीं पहुँच पाता, कवि के लिए गम्य माने गए हैं। इसीलिए श्रेष्ठ कविता को किसी संकुचित दृष्टि से देखना कदापि सही नहीं माना गया। इसके लिए तो व्यापक और अनेकायामी कसौटी की ज़रूरत होती है। प्रो. ऋषभ देव शर्मा (1957) की आलोचना-कृति 'हिंदी कविता: अतीत से वर्तमान' (2021) में ऐसी ही व्यापक और अनेकायामी दृष्टि अपनाई गई है। समकालीन हिंदी कविता की विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए यह पुस्तक समकालीन हिंदी कविता के उत्तरआधुनिक स्वरूप और उसमें अवतरित विविध विमर्शों का भी तात्विक विश्लेषण  करती है। 


लेखक ने पुस्तक को 8 अध्यायों में विभाजित किया है- नींव का परिवेश और विचारों की यात्रा; देश के सिर से बहते हुए रक्त से कविता की बातचीत; सामाजिकता, परंपराबोध और कविता; कविता और राजनीति का आमना-सामना; आंदोलनों के मंच पर बोलती कविता; कविता की समग्र दृष्टि से साक्षात्कार;  कविता की रचनाधर्मिता: जनपद और लोक; उत्तर-आधुनिकता के क्षितिज पर विमर्शों का इंद्रधनुष।


बात शुरू होती है 'नींव का परिवेश और विचारों की यात्रा' से। इस अध्याय में लेखक ने 'पचासोत्तर कविता के बीस वर्ष' नामक शीर्षक के अंतर्गत भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अंश को रेखांकित करने के साथ बड़ी महत्वपूर्ण बात यह भी लिखी है कि, '1950-1970 तक की कविता यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है लोकजीवन और लोक संस्कृति तथा प्रकृति के साथ कविता का संबंध। विषमताओं से जूझते हुए भी कभी न तो लोक जीवन से अपना संबंध तोड़ पाया है और न प्रकृति, प्रेम तथा सौंदर्य से। कविता में इन सब की धाराएं लगातार बहती रही हैं। उदाहरण देखिए- बाँदा  की गलियाँ, सड़कें, चौराहे, मानव,/ वृक्ष, लताएँ, बंबेश्वर, वह केन किनारा/चट्टानों के ढोके और मकानों की छवि/ आँखों के भीतर फिरती है मन में नव-नव/  रंग तरंग उठाते हैं लहरीली धारा/ पकड़े है वह अस्ताचल का प्रतिबिंबित रवि'। 


पाठक के रूप में मुझे आकर्षित किया अध्याय पाँच ने। इस अध्याय का शीर्षक है 'आंदोलनों के मंच पर बोलती कविता'। आज के युग में अमूनन हर कोई कविता लिख रहा है, कहानी लिख रहा है और भी बहुत कुछ लिख रहा है, लेकिन कुछ भी लिखने से पहले हम क्या लिख रहे हैं और हमें क्या लिखना चाहिए, इसका तार्किक विश्लेषण लेखक को करना चाहिए। जो कवि बनना चाहते हैं, उन्हें इस अध्याय का पठन-पाठन सबसे पहले करना चाहिए ताकि  समझ सकें कि आधुनिक कविता ने अपने आप को कहाँ-कहाँ तक विकसित कर लिया है। अरुण कमल ने बड़ी अच्छी बात कही है,'एक कवि की उम्र कुछ साल नहीं, बल्कि 5000 साल से भी ज्यादा होती है- वे सारे वर्ष जिनमें मनुष्य विभिन्न अवस्थाओं को पार करता यहाँ तक आया। इसलिए कविता की रचना प्रक्रिया बहुत जटिल होती है। जो हो चुका- जो है- जो होगा- सबका समाहार; यही कवि का धर्म है'। कहानी, उपन्यास आदि इन सब विधाओं में तो यह समझ में आता है कि किन-किन आंदोलनों को पार करता हुआ और कहाँ-कहाँ से गुजरते हुए ये विधाएं समकालीन विमर्शों के साथ किस प्रकार से जुड़ी हुई हैं। लेकिन हिंदी कविता के संबंध में इन जानकारियों की बहुत कम जानकारी सामान्य पाठक को है। लेखक ने इस अध्याय में नवगीत, अगीत, गजल, तेवरी आदि से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों को प्रस्तुत पुस्तक  के केंद्र में रखा है। साथ ही स्त्री विमर्श, दलित विमर्श,आदिवासी विमर्श के साथ किस प्रकार से समकालीन कविता जुड़कर अपने आप को विकसित कर रही है, इसका गहन विश्लेषण किया गया है। यह विवेच्य पुस्तक की अपनी एक अलग विशेषता है। 


यह तो हमें पता ही है कि कविता और राष्ट्रीयता का संबंध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का अनिवार्य हिस्सा है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही लेखक ने 'देश के सिर से बहते हुए रक्त से कविता की बातचीत' नामक अध्याय के अंतर्गत राष्ट्रीय संकट की ओर संकेत देने के साथ ही राष्ट्र निर्माण का आह्वान भी किया है। लेखक भावुक साहित्यकार होने से पहले तत्वान्वेषी बौद्धिक भी हैं, तभी तो उन्होंने अंध राष्ट्रभक्ति का विरोध करते हुए लिखा है, 'अंध राष्ट्रभक्ति अविवेक और आवेश पर आधारित होती है। यह व्यक्ति के मन में राष्ट्र के प्रति उन्माद की स्थिति का वह प्रेम है, जो प्रायः निराशाजन्य या युद्ध की परिस्थितियों में पैदा होता है'। 


आधुनिक समाज के दो महत्वपूर्ण तत्व हैं- विज्ञान और परंपरागत सामाजिक मान्यताएं तथा मूल्य। विज्ञान और परंपरा इन दोनों के बीच समकालीन कविता किस प्रकार से अपने को स्थापित कर रही है इसका विश्लेषण करते हुए लेखक लिखते हैं, 'सत्तरोत्तर कविता समाज की दुरभिसंधियों के विरुद्ध मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक संवेदना को जगाना चाहती है। उदाहरण के रूप में  लेखक ने विनीता निर्झर की कविता 'ये तारे' की कुछ पंक्तियों को उद्धृत किया है- देखो.... देखो/ वह बुढ़िया डूब रही है..../ उसे डूबने दो, इधर देखो/ अरे.... पकड़ो.... पकड़ो..तैर कर पकड़ो/ मेरी इंपोर्टेड टॉवेल/ बही जा रही है'। 


अध्याय चार 'कविता और राजनीति का आमना सामना' के अंतर्गत लेखक ने स्वातन्त्रयोत्तर भारतीय राजनीति किस प्रकार से बेहद अस्थिर रही और किस प्रकार से इस समय कविता ने अपने आप को विकसित किया, इसका तार्किक विश्लेषण किया है।


पुस्तक के आरंभ में ही प्रो. देवराज का यह कथन  बहुत सार्थक है कि, 'आठवें दशक और उसके बाद की हिंदी कविता का अध्ययन अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।' इसका विस्तार  करते हुए प्रो. गोपाल शर्मा  ने प्रतिपादित है, 'समकालीन भारतीय जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों के भुक्तभोगी और प्रत्यक्षदर्शी प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने समकालीन कविता और अपने समय के अंतर्संबंध को इस पुस्तक में बड़े आत्मविश्वास और विशेषज्ञता से लेखनीबद्ध किया है'। स्पष्ट है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की प्रस्तुत पुस्तक में आज़ादी के बाद की तमाम कविता  की विभिन्न चुनौतियों का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।


कुल मिलाकर, ऋषभदेव शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक 'हिंदी कविता: अतीत से वर्तमान' का अध्ययन साहित्य प्रेमियों को अवश्य करना चाहिए और शोधार्थियों को तो इसका गहन अध्ययन करना ही चाहिए।


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समीक्षित कृति- #हिंदी_कविता_अतीत_से_वर्तमान (आलोचना)

लेखक- डॉ. ऋषभ देव शर्मा

प्रथम संस्करण- 2021

प्रकाशक- साहित्य रत्नाकर, रामालय,  प्रथम तल, 15, सिद्धार्थनगर, गूवा गार्डन, कल्याणपुर, कानपुर - 208016, (उत्तर प्रदेश)।

Aman Prakashan 

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समीक्षक: डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

Suparna Mukherjee

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