मंगलवार, 2 नवंबर 2021

माणिक्य_चौक_3 / राकेशरेणु

 


किसी भी समाज के लिए कविता जीवन का ज़रूरी तत्व है। इतिहास में हरेक समाज ने हर काल में अपने सुख-दुख सहित समस्त मनोभावों को कविता के मार्फ़त व्यक्त किया है। लोकगीत उन्हीं मनोभावों की अभिव्यक्ति हैं। धनरोपनी करती, जाँता चलाती, धान कूटती औरतों के गान और बाज़ मर्तबा घोर पीड़ा में चीत्कार के साथ-साथ एक लयबद्ध गीतात्मक ध्वनि सुनाई देती है। यह उनकी अनिवार्य सहचरी है- हमेशा साथ निभाने वाली। मनुष्य ही क्यों पशु-पक्षियों, तमाम जीवों की ध्वनियों पर यदि ग़ौर करें तो उनमें भी लयात्मक कविताई सुनाई देती है। कविता वहाँ भी है, भले हम उन्हें समझ न पाएँ। मनुष्य की तरह वे भी अपने मनोभाव और सुख-दुःख कविता के ज़रिए व्यक्त करते हैं। कोरोना काल की रातों में पसरे भयावह मौन के बीच कुत्तों के रोदन में भी इसे सुना जा सकता था जो एम्बुलेंस की सायरन पर और तेज़ और सामूहिक हो जाता।


महामारी काल में जब हम सब आत्यंतिक पीड़ा, भय और अनिश्चितता से गुज़र रहे थे, कविता ने फिर हमारा साथ निभाया - अनेक रूपों में हमारी तक़लीफ़ को अभिव्यक्ति दी। उम्मीद और साहस की डोर थमाए रखा। संभवत: कविता की सफलता और सार्थकता यही है, वह हमारी तक़लीफ़ को अभिव्यक्ति देती है और उससे मुक़ाबिल होने का साहस और धैर्य भी। निज से निकलकर सर्व की ओर बढ़ती हुई; तात्कालिकता की सीमाएँ उलाँघ सार्वकालिक होती हुई। कविता की यह सार्वजनीन और सार्वकालिक प्रवृत्ति ही उसे यादगार बनाती है।


कविता की इसी ताक़त ने महामारी काल में कवियों को संबल दिया। अधिकांश कवियों ने कोरोना केन्द्रित कविताएँ लिखीं।श्रीप्रकाश शुक्ल ने इन्हें कोरोज़ीवी कविता कहा है और इसकी एक पूरी सैद्धांतिकी तैयार कर दी। श्रीप्रकाश जी का यह आलेख ‘आजकल’ के नवंबर 2020 अंक में प्रकाशित हुआ था। कोरोजीवी कविताओं के अब तक कई संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से जो संकलन सर्वाधिक ध्यान खींचता है वह है सुपरिचित आलोचक अरुण होता द्वारा सम्पादित ‘तिमिर में ज्योति जैसे’। 


सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘तिमिर में ज्योति जैसे’ में कुल 43 कवि शामिल हैं। इनमें विगत प्रायः छह दशकों से रचनारत अशोक वाजपेयी और राजेश जोशी हैं तो नवीनतम कवियों में नवीन गोलेंद्र पटेल भी हैं। बीच के महत्वपूर्ण कवि तो हैं ही। अपनी पंद्रह पृष्ठ की विस्तृत भूमिका में अरुण होता बताते हैं कि पुस्तक के नाम की प्रेरणा उन्हें निराला की ‘रेखा’ शीर्षक कविता पढ़ते हुए मिली। भूमिका न केवल पुस्तक की योजना और कविताओं के संदर्भ में संपादक की दृष्टि का बल्कि उस समय का भी मुकम्मल बयान है जिस दौरान ये कविताएँ संभव हुईं।


अशोक वाजपेयी लिखते हैं, ‘उम्मीद किसी कचरे के छूट गए हिस्से की तरह/ किसी कोने में दुबकी पड़ी है/ जो आज नहीं तो कल बुहार कर फेंक दी जाएगी।/ हम अपना समय लिख नहीं पाएंगे।’ इन कविता पंक्तियों में जो दुःख है और शीर्षक पंक्ति ‘हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे’ में निहित व्यंजना ही इस समय का- महामारी काल का सशक्त आलेख है।


राजेश जोशी की कविता है ‘क्या मेरी आवाज़ आ रही है’ जहाँ वे कहते हैं कि ‘अन्याय के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ें/ बंद हो चुकी हैं जेलों में/ कोई मुन्सिफ़, कोई वक़ील, न कोई गवाह/ सिर्फ़ फ़ैसले सुनाए जा रहे हैं/ और मुक़र्रर की जा र

ही है सज़ाएँ’, और फिर, ‘घरों के दरवाज़े बंद और सड़कें सूनी/ आभासी दुनिया में बार-बार पूछता कोई एक ही सवाल/ क्या मेरी आवाज़ आ रही है’। यह प्रतिरोध की आवाजों के बंद किए जाने और अपनी आवाज़ या ख़ुद पर भरोसा टूटने का समय है।


मदन कश्यप अपनी छोटी-सी कविता ‘कोरोना त्रिपदी’ में ख़ुद के निरीश्वर होने की कामना करते हैं। यहाँ कवि व्यक्ति-मात्र नहीं है, वह अपने समय और समाज का प्रतीक है जो निरीश्वर होना चाहता है। अगली कविता ‘इस कोरोना समय में’ वह ईश्वर के न रहने, उसकी मृत्यु की इच्छा ज़ाहिर करता है, यह कहता हुआ कि ‘नई सदी में ताक़तवर और हृष्ट पुष्ट हो चुका ईश्वर/ अचानक निरीह दिखने लगा है/ इस कोरोना समय में/ मैं मरने से पहले/ ईश्वर को मरता हुआ देखना चाहता हूँ।’ लगभग ऐसा ही वर्णन युवतर कवि कुमार मंगलम की कविता ‘विदाई’ में है जहाँ वे लिखते हैं- ‘यह अनंत मृत्यु का दौर है/ इतना कि मर जाएँ/ और कोई अंतिम विदाई न दे/ यह मनुष्य के ही नहीं/ ईश्वर के भी मर जाने का वक़्त है।’ 


कुमार अंबुज अपने समय का आख्यान इन शब्दों में लिखते हैं - ‘नयी नागरिक जीवनी/ मैं एक महादेश में पैदा हुआ/ और एक विशाल गोशाला में मारा गया।’ (नींद में मृत्यु) जबकि यतीश कुमार पृथ्वी को पट्टियों सा बाँधे हुए देखते हैं जहाँ ‘अजन्मे बच्चे ने चलकर/ अभी-अभी नापी है पूरी धरती।’ (मैं सड़क हूँ)


उपरोक्त उद्धरणों का प्रयोजन इस संग्रह की समीक्षा करना नहीं बल्कि कुछ कविता पंक्तियों के मार्फ़त उसके महत्व को इंगित करना है। उद्धरण योग्य पंक्तियाँ यहाँ शामिल प्रायः सभी कवियों पास हैं। संपादक की पैनी चयन-दृष्टि ने महामारी काल की श्रेष्ठ कविताओं को संकलित किया है।


यह रेखांकित करना भी ज़रूरी है कि साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में विगत कुछ वर्षों में सेतु प्रकाशन ने आश्चर्यजनक रूप से उल्लेखनीय और सराहनीय काम किया है।  इसे संभव करने वालों में अमिता पाण्डेय और अमिताभ राय जैसे दृष्टि-सम्पन्न साहित्यिक हैं जिनसे यह भरोसा पैदा होता है कि पाठक और लेखक के लिए स्तरीय साहित्य का सिलसिला बग़ैर मोलभाव के जारी रहेगा।

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