शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

सहस्त्रमुख रावण की कथा*/ कृष्ण mehtav

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लंका विज़यके बाद श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया था। इस अवसर पर इनके अभिनन्दन के लिये सभी ऋषि मुनि  राजदरबार में, उपस्थित हए। 


उन्होंने एक स्वर से कहा – रावण के मारे जाने से अब विश्व में शान्ति स्थापित हो गयी है। सब लोग सुख और शान्ति की श्वास ले रहे है। 


उस समय मुनियो द्वारा श्रीराम के पराक्रम और रावण के विनाश की बात सुनकर देवी सीता को हँसी आ गयी। 


इस समय में उनकी हंसी देखकर सबका ध्यान उनकी तरफ गया और मुनियों ने देवी सीता से हंसी का कारण पूछा।


इस पर सीता ने रामजी तथा मुनियों की आज्ञा लेकर एक अद्भुत वृत्तान्त बतलाते हुए कहा :


जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता महाराज जनक ने अपने घर मे एक ब्राह्मण को आदरपूर्वक चातुर्मास्य व्रत करवाया। 


मैं भलीभांति ब्राह्मण देवता की सेवा करती थी। अवकाश के समय ब्राह्मण देवता तरह तरह की कथा मुझे सुनाया करते थे। 


एक दिन उन्होंने सहस्त्रमुख रावण का वृत्तान्त सुनाया, जो इस प्रकार है-


विश्रवा मुनि की पत्नी का नाम कैकसी था। कैकसी ने दो पुत्रों को जन्म दिया। 


बड़े का नाम सहस्त्रमुख रावण था और छोटे का नाम दशमुख रावण। 


दशमुख रावण ब्रह्मा के वरदान से तीनों लोको को जीत कर लंका मे निवास करता है और बड़ा पुत्र पुष्कर द्वीप में अपने नाना सुमालि के पास रहता है। 


वह बड़ा बलवान है। मेरु को सरसों के समान, समुद्र को गाय के खुर और तीनों लोकों को तृणके समान समझता है। सब को सताना उसका काम है। 


जब सारा संसार उससे त्रस्त हो गया, तब ब्रह्माने उसे “वत्स ! पुत्र !  आदि प्यार भरे सम्बोधनों से प्रसन्न किया और किसी तरह इस कुकृत्यसे रोका। उसका उत्पात तो कम हो गया, परंतु समूल गया नहीं। 


उस सहस्त्र मुख रावण की कथा सुनाकर वे ब्राह्मण यथा समय वापस लौट गये किंतु आज भी वह घटना वैसी ही याद है। 


आज आप लोग दशमुख रावण के मारे जाने से ही सर्वत्र सुख शांति की बात कैसे कर रहे हैं.. 


जबकि पुष्कर द्वीप में सहस्त्रमुख रावण का अत्याचार अभी भी कम नहीं हुआ है, यही सुन कर मुझे हंसी आ गयी, इसके लिये आप सभी मुझे क्षमा करे। 


मेरे स्वामी ने दशमुख रावण का विनाश कर महान् पराक्रम का परिचय अवश्य दिया है; किंतु जब तक वह सहस्त्रमुख रावण नहीं मारा जाता, जगत्में पुर्ण आनन्द कैसे हो सकता है ? 


इस हितकारिणी और प्रेरणादायक वाणी को सुन कर श्रीराम ने उसी क्षण पुष्पक विमान का स्मरण किया और इस  शुभकार्य को शीघ्र सम्पन्न करना चाहा। 


वानरराज़ सुग्रीव और राक्षस राज विभीषण को दलबल के साथ बुला लिया गया। 


इसके बाद बड़ी सेना के साथ श्रीराम ने पुष्पक विमान से पुष्कर क्षेत्र के लिये प्रस्थान किया। 


देवी सीता, सभी भाई और मंत्रीगण साथ थे। पुष्पक की तो अबाध गति थी, वह शीघ्र पुष्कर पहुंच गया। 


जब सहस्त्रमुख रावण ने सुना कि उससे युद्ध करने के लिये कोई आया है तो उसके गर्व को बहुत ठेस पहुंची। 


वह तुरत संग्राम में आ पहुचा। वहाँ मनुष्यों, वानरों और भालुओं की लंबी कतार देखकर वह हँस पड़। 


उसने सोचा, इन क्षुद्र ज़न्तुओ से क्या लड़ना है। क्यों न इनको इनके देश भेज दिया जाय  ऐसा सोचकर उसने वायव्यास्त्र का प्रयोग किया। 


जैसे केई बलवान् व्यक्ति बच्चों को गलबहियाँ देकर बाहर निकाल देता है, वैसे वायव्यास्त्र ने सभी प्राणियों को बाहर निकाल दिया। 


केवल चारों भाई, सीताजी, हनुमान, नल, नील, जाम्बवान, विभीषण पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा। अपनी सेना की यह स्थिति देखकर श्रीराम सहस्त्रमुख पर टूट पड़े। 


श्री राम के अमोघ बाणों से राक्षस तिल-तिल कटने लगे। यह देख सहस्त्रमुख रावण क्षुब्ध हो गया। 


वह गरजकर बोला – आज मैं अकेले ही सारे संसार को मनुष्यों और देवताओं से रहित कर दूँगा। 


यह कहकर वह जोर शोर से राम पर बाण चलाने लगा। श्रीरामने भी इसका जबरदस्त जवाब दिया है धीरे धीरे युद्ध ने लोमहर्षक रूप धारण कर लिया।


सहस्त्रमुख ने पन्नगास्त्र का प्रयोग किया। फलत: विषधर सर्पो से समस्त दिशाएँ एवं विदिशा व्याप्त हो गयी। राम ने सौपर्णेयास्त्र से उसे काट दिया। 


इसके बाद श्रीराम ने उस बाण का संधान किया जिससे इन्होंने रावण को मारा था, किंतु सहस्त्रमुख राबण ने इसे हाथ से पकड़ कर तोड़ दिया और एक बाण मारकर श्रीराम को मूर्छित कर दिया।


श्री राम को मूर्छित देखकर सहस्त्रमुख अतीव प्रसत्र हुआ। यह दो हजार हाथो को उठाकर नाचने लगा। 


सती स्वरूपिणी सीता यह सब सह न सकीं। उन्होंने महाकाली का विकराल रूप धारण का लिया और एक ही निमेष मे सहस्त्रमुख रावणका सिर काट लिया। सेना को तहस नहस कर दिया। 


यह सब क्षणभर में हो गया। सहस्त्रमुख रावण ससैन्य मारा गया, किंतु महाकाली का  क्रोध शान्त नहीं हुआ।


उनके रोम-रोमसे सहस्त्रों मातृका: उत्पन्न हो गयी, जो घोर रूप धारण किये हुए थीं। महाकाली के रोष से सारा ब्रह्माण्ड भयभीत हो गया। पृथिवी काँपने लगी। देवता भयभीत हो गये। 


तब ब्रह्मादि देवगण उनके क्रोध को शान्त करने के लिये उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुतियों से किसी तरह देवी का क्रोध शान्त हुआ। 


श्रीराम भी चैतन्यता को प्राप्त हो गये। 


देवीने अपना विराठ रूप दिखा कर सभी को आश्वस्त कर दिया। सभी ने मिलकर उस आदिशक्ति की आराधना की।  स्वयं भगवान् श्री राम ने सहस्त्रनाम स्तोत्र से देवी की आराधना की।

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