शनिवार, 30 अक्तूबर 2021

अनुनय / राकेश रेणु

 अनुनय*


उदास किसान के गान की तरह

शिशु की मुस्कान की तरह

खेतों में बरसात की तरह

नदियों में प्रवाह की तरह लौटो।

 

लौट आओ

जैसे लौटती है सुबह

अँधेरी रात के बाद

जैसे सूरज लौट आता है

सर्द और कठुआए मौसम में

जैसे जनवरी के बाद फरवरी लौटता है

पूस-माघ के बाद फागुन वैसे ही

वसंत बन कर लौटो तुम!

 

लौट आओ

पेड़ों पर बौर की तरह

थनों में दूध की तरह

जैसे लौटता है साइबेरियाई पक्षी सात समुंदर पार से

प्रेम करने के लिए इसी धरा पर

प्रेमी की प्रार्थना की तरह

लहराती लहरों की तरह लौटो!

 

लौट आओ

कि लौटना बुरा नहीं है

यदि लौटा जाए जीवन की तरह

हेय नहीं लौटना 

यदि लौटा जाए गति और प्रवाह की तरफ

न ही अपमानजनक है यह

यदि सँजोये हो सृजन के अंकुर। 


लौटने से ही सम्भव हुईं

ऋतुएँ, फसलें, जीवन, दिन-रात

लौटो, लौटने में हैं संभावनाएँ अनंत। 


*राकेशरेणु

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