रविवार, 24 अक्तूबर 2021

महावीर प्रसाद द्विवेदी पर कुछ विचार / भारत यायावर

 


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 महावीर प्रसाद द्विवेदी एक ऐसे साहित्यकार थे, जो बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रूचि रखते थे। उन्होंने ‘सरस्वती’ का अठारह वर्षों तक संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया था। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने समालोचना की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे भाषाशास्त्री थे, अनुवादक थे, वैय्याकरणिक थे, इतिहासज्ञ थे, अर्थशास्त्री थे तथा विज्ञान में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे।


 महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले साहित्यकार थे, जिनको ‘आचार्च’ की उपाधि मिली थी। इसके पूर्व संस्कृत में आचार्यों की एक परम्परा थी। मई, 1933 ई॰ में नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कर द्विवेदी का अभिनन्दन किया था एवं उनके सम्मान में ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रंथ’ का प्रकाशन कर, उन्हें समर्पित किया था। इस अवसर पर द्विवेदी जी ने जो अपना वक्तव्य दिया था, वह ‘आत्म-निवेदन’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इस ‘आत्म-निवेदन’ में वे कहते हैं - “मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ?“ 


 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। द्विवेदीजी ने लिखा है - “पहले तीन सिद्धांतों के अनुकूल आचरण करना तो सहज था; पर औथे के अनुकूल सचेत रहना कठिन था। तथापि सतत् अभ्यास से उसमें भी सफलता होती गई। तारबाबू होकर भी, टिकट बाबू, मालबाबू, स्टेशन मास्टर, यहाँ तक कि रेल पटरियाँ बिछाने और उसकी सड़क की निगरानी करने वाले प्लेट-लेयर ;च्मतउंदमदज ूंल प्देचमबजवतद्ध तक का भी काम मैंने सीख लिया। फल अच्छा ही हुआ। अफसरों की नजर मुझ पर पड़ी। मेरी तरक्की होती गई। वह इस तरह कि एक दफे छोड़कर मुझे तरक्की के लिए दरख्वास्त नहीं देनी पड़ी।“ द्विवेदी जी 15 रु॰ मासिक पर रेलवे में बहाल हुए थे और जब उन्होंने 1904 ई॰ में नौकरी छोड़ी उस वक्त उन्हें 150 रु॰ मूल वेतन एवं 50 रु॰ भत्ता मिलता था, यानी कुल 200 रु॰। उस जमाने में यह एक बहुत बड़ी राशि थी। वे 18 वर्ष की उम्र में रेलवे में बहाल हुए थे। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था और 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपांतर है। इसका प्रकाशन 1889 में हुआ। इसमें द्विवेदी जी ने सभी पद्यरचनाओं का भावार्थ खड़ी बोली गद्य में भी किया है। उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है - “इस कार्य में हुशंगाबादस्थ बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ का जो साम्प्रत मध्यप्रदेश राजधानी नागपुर में विराजमान हैं, मैं परम कृतज्ञ हूँ।“ अपने ‘आत्म-निवेदन’ में उन्होंने लिखा है - “बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।“ 1889 से 1892 ई॰ तक द्विवेदी जी की इस प्रकार की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई - विनय-विनोद, विहार-वाटिका, स्नेहमाला, ऋतु तरंगिनी, देवी स्तुति शतक, श्री गंगालहरी आदि। 1896 ई॰ में इन्होंने लाॅर्ड बेकन के निबन्धों का हिन्दी में भावार्थमूलक रूपान्तर किया, जो ‘बेकन-विचार-रत्नावली’ पुस्तक में संकलित हैं। 1898 ई॰ में इन्होंने ‘हिन्दी कालिदास की आलोचना’ लिखी, जो हिन्दी की पहली आलोचनात्मक पुस्तक है। 1899 ई॰ में श्रीहर्ष के नैषधीयचरितम पर इन्होंने ‘नैषष-चरित-चर्चा’ नामक आलोचनात्मक एवं गवेषणात्मक पुस्तक लिखी। यह सिलसिला जो शुरू हुआ, वह 1930-31 ई॰ तक चला और द्विवेदी जी की कुल पचासी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 


 जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। अपने प्रकाण्ड पांडित्य के कारण इन्हें ‘आचार्य’ कहा जाने लगा। उनके व्यक्तित्व के बारे में आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है - “उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ।“ द्विवेदी जी का मानना था कि “ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है।“ द्विवेदी जी स्वयं तो एक ‘महान् ज्ञान-राशि’ थे ही उनका सम्पूर्ण वांगमय भी संचित ज्ञानराशि है, जिससे होकर गुजरना अपनी जातीय परम्परा को आत्मसात करते हुए विश्वचिंतन के समक्ष भी होना है। डाॅ॰ रामविलास शर्मा ने द्विवेदी जी के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है - “द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए।“


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 ऐसे महान् ज्ञान-राशि के पुंज थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी। किन्तु रामविलास शर्मा के पूर्व जितने भी आलोचक हुए, उन्होंने द्विवेदी जी का उचित मूल्यांकन तो नहीं ही किया, अपितु उनका अवमूल्यन ही किया। इन महान् आलोचकों में रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी एवं हजारीप्रसाद द्विवेदी प्रमुख हैं। 

 रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में द्विवेदीजी पर जो टिप्पणी की है, उसपर एक नजर डालें: “द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के संपादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है।“ 

 इसी प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल आगे लिखते हैं - “कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबंधों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है।“


 अब आप देखें कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखन के प्रति रामचन्द्र शुक्ल की ये टिप्पणी पढ़कर हिन्दी का कोई भी पाठक उससे विरक्त होगा या आशक्त। रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को हिन्दी के विद्यार्थी वर्षों से आप्त वचनों की तरह याद करते आ रहे हैं। ऐसे में मूल पाठ से उनके आप्त वाक्यों का यदि मिलान कर परीक्षण न किया जाए, तो अनर्थ होगा ही। 


 रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के सबसे बड़े समालोचक, सबसे बड़े साहित्येतिहास-लेखक। इसी इतिहास में वे महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को सिर्फ भाषा-परिष्कारकत्र्ता के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके शब्द हैं “यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गंभीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।“ अब पाठक स्वयं रामचन्द्र शुक्ल की उपरोक्त पंक्तियों को देखें। क्या यहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबा कर कसे गये हैं ? क्या यहाँ ‘बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर नहीं कही गई हैं’ ? क्या शुक्लजी ‘मोटी अक्ल के पाठकों के लिए’ ही ये सब लिख रहे हैं ? दरअसल शुक्ल जी जिस आलोचना-पद्धत्ति का सहारा लेकर उक्त बातें लिख रहे थे, उसे अंग्रेजी में श्रनकपबपंस ब्तपजपबपेउ और हिन्दी में निर्णयात्मक आलोचना कहते हैं और इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि इसने आलोचना के क्षेत्र में आलोचकों का ध्यान ऐतिहासिक युग, वातावरण एवं जीवन से हटाकर अधिकांशतः कलापक्ष तक ही सीमित कर दिया है। कलापक्ष की ओर ध्यान देने वाले आलोचकों का कहना है कि युगीन परिस्थितियाँ, युगीन चेतना और युग सत्य निरंतर परिवर्तनशील है अतएव इन्हें आधार नहीं बनाया जा सकता। उनकी परिवर्तनशीलता के कारण इन्हें साहित्य का स्थायी मानदण्ड नहीं स्वीकार किया जा सकता। लेकिन इसी के साथ यह भी सत्य है कि ऐसी दशा में निर्णयात्मक आलोचना का कोई मूल्य नहीं रहेगा। इसका मुख्य कारण है ऐसे आलोचक का रचनाकार और रचना पर फतवे जारी करना। रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में ऐसे फतवे जगह-जगह भरे पड़े हैं। उन्होंने कृतियों के महत्त्व को उनके कलापक्ष के कारण स्वीकार किया। उनका कलावादी दृष्टिकोण ‘रस-मीमांसा’ के काव्यशास्त्रीय आधार से निर्मित हुआ था। यही कारण है कि उन्होंने द्विवेदी जी के विचारों को, उनके संचित ज्ञान-राशि पर ध्यान नहीं दिया और उनकी भाषा पर विचार किया। ‘मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर’ - यह अभिव्यक्ति की प्रणाली पर बात की जा रही है, जो निस्संदेह भाषा है। जब द्विवेदी जी मूर्ख या मोटे दिमाग वालों के लिए लिखते थे और मोटी तरह से लिखते थे तो उन्होंने भाषा परिष्कार कैसे किया ? जिस लेखक की भाषा की सतही समझ होगी, वह दूसरे लेखकों की भाषा को दुरूस्त कैसे करेगा ? पुनः रामचन्द्र शुक्ल की बातों पर विचार करें - महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शाश्वत साहित्य या स्थायी साहित्य नहीं लिखा। उनका महत्त्व भाषा-सुधार में है और उनकी भाषा कैसी है - मोटी अक्लवालों के लिए है। इसतरह की असंगत बातों से आचार्य शुक्ल का इतिहास भरा हुआ है। किसी आलोचक ने इसकी अब तक ढंग से समीक्षा भी नहीं लिखी है और यह हिन्दी साहित्य का अब तक श्रेष्ठ इतिहास बना हुआ है। हिन्दी के पाठक इसमें दिये हुए फतवों को आप्त वचनों की तरह याद करते रहते हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा लिखते हुए लिखा है - “इसतरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे।“ 


 सन् 1933 ई॰ में आचार्य द्विवेदी को नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा अभिनन्दन ग्रंथ भेंट किया गया। इसकी प्रस्तावना श्यामसुन्दर दास एवं राय कृष्णदास के नाम से प्रकाशित हुई, किन्तु यह लिखा गया था नन्ददुलारे वाजपेयी के द्वारा। इसलिए यह 1940 ई॰ में प्रकाशित वाजपेयी जी की पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी’ में संकलित है। इसमें यह विचार किया गया है कि स्थायी या शाश्वत साहित्य में द्विवेदी जी का साहित्य परिगणित हो सकता है या नहीं। इस दृष्टिकोण से महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित सम्पूर्ण साहित्य को अयोग्य ठहरा दिया गया। सिर्फ उनके द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ के अंकों को ही महत्त्व दिया गया। 

 1952 ई॰ में हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ नामक पुस्तक छपी। इसमें एक जगह वे लिखते हैं - “पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई।“ अब सवाल यह उठता है कि यदि महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध गम्भीर नहीं हैं तो उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में सहायता कैसे पहुँचाई ? 


 ये तमाम बातें महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान पर धूल डालने की कोशिश थी। किन्तु, ऐसे रचनाकार भी थे जो द्विवेदीजी के महत्त्व को रेखांकित कर रहे थे, उनमें प्रमुख थे - प्रेमचंद, निराला और पंत। मैथिलीशरण गुप्त तो उनके शिष्य थे ही। पंत ने 1931-32 में द्विवेदी जी पर दो कविताएँ लिखीं। सुमित्रानंदन पंत की कविता की चार पंक्तियाँ देखें -


आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर

भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर,

दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर

उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर


 1933 ई॰ में प्रेमचंद ने ‘हंस’ का द्विवेदी जी पर विशेषांक निकाला। वह भी अप्रैल एवं मई के दो अंकों में। अप्रैल, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं - “आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया।“ 

 यह था आचार्य द्विवेदी का ऐतिहासिक योगदान। इसी क्रम में आगे प्रेमचंद द्विवेदी जी का शब्द-चित्र इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं - “द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवत्र्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है।“ 


 मई, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय पुनः प्रेमचंद ने आचार्य द्विवेदी पर लिखा एवं उनके महत्त्व को सही ढंग से प्रतिपादित किया। वे कहते हैं - “द्विवेदी जी का जीवन - साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक  लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी।“


3

 ‘सरस्वती’ पत्रिका इलाहाबाद के इंडियन प्रेस से छपती थी, किन्तु द्विवेदी जी कानपुर के निकट के एक गाँव जूही में रहकर उसका सम्पादन करते थे। वे खपड़ैल के एक मकान में रहते थे। प्रेमचन्द ने जिस कुटिया का उल्लेख किया है, वह यही है। अब जूही कानपुर शहर का एक मुहल्ला हो गया है। प्रेमचन्द ने द्विवेदी जी के महत्त्व को सही रूप में प्रतिपादित किया है। उनका महत्त्व ज्ञान-विज्ञान का प्रसार कर हिन्दी जनता में जागृति लाने को लेकर था। बाद में रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ नामक पुस्तक लिखकर द्विवेदी जी के ऐतिहासिक योगदान को उसी रूप में व्याख्यायित किया, जिसे प्रेमचन्द उसी वक्त पहचान रहे थे। वे शाश्वत साहित्य या कलात्मक साहित्य की दृष्टि से द्विवेदी जी के साहित्य को नहीं देख रहे थे।


 मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से इलाहाबाद के लेखकों ने इलाहाबाद में ‘द्विवेदी-मेला’ का आयोजन किया था। इसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी को सम्मानित करने पूरा हिन्दी जगत उमड़ पड़ा था। कहते हैं, इतना बड़ा लेखकों का जमावड़ा पहली बार इस अवसर पर हुआ। इसके केन्द्र में द्विवेदी जी थे। वे हिन्दी लेखकों के परम आदरणीय ऐतिहासिक पुरुष की तरह उपस्थित थे। निराला ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में ‘आचार्य अमर हों !’ नामक टिप्पणी में उनका जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है, वह बेहद जीवंत और यथार्थ है - “उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की           प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है।“


 कहना न होगा कि रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी और हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचारों के बरक्स प्रेमचंद एवं निराला ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को, उनके अमर व्यक्तित्व की अमिट छाप को सही रूप में समझा और मूल्यांकित किया। 


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 महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले लेखक थे, जिन्होंने अपनी जातीय परम्परा का गहन अध्ययन ही सिर्फ नहीं किया था, उसे आलोचनात्मक दृष्टि से भी देखा था। उन्होंने वेदों से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के संस्कृत-साहित्य की निरन्तर प्रवहमान धारा का अवगाहन किया था एवं उपयोगिता तथा कलात्मक योगदान के प्रति एक वैज्ञानिक नजरिया अपनाया था। जब द्विवेदी जी देखते हैं कि वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा बढ़ रही है, लोग वेदों का अध्ययन न कर इसे ईश्वरकृत मान सिर्फ पूजन-आराधन कर रहे हैं, तो वे क्षुब्ध होते हैं। उनके शब्द देखिए - “वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ।“ 

 उस समय क्या आज भी यह मान्यता बहुतेरे लोगों में मिलेगी कि “वैदिक ऋषि मंत्र-द्रष्टा थे। उन्होंने योगबल से ईश्वर से प्रत्यादेश की तरह वैदिक मंत्र प्राप्त किये हैं।“ द्विवेदी जी इस मान्यता का खण्डन करते हुए आगे लिखते हैं - “यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है।“ 


 यह था उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उन्मेष, जो हिन्दी-साहित्य में पहले-पहल महावीर प्रसाद द्विवेदी के चिन्तन एवं लेखन के द्वारा प्रस्फुटित हुआ था। पाठक द्विवेदीजी के उपरोक्त मंतव्य से यह न समझें कि वे वेदों को निरर्थक समझते थे। उनका स्पष्ट मत था कि वेद पूजा-पाठ करने की चीज नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक महत्त्व के ग्रंथ हैं। वेदों का अध्ययन हमें अवश्य करना चाहिए और इस दृष्टिकोण से कि “वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है।“  

 इस प्रकार द्विवेदी जी वेदों से संस्कृत-साहित्य की जो परंपरा या इतिहास है, उस पर गवेषणात्मक, विवेचनात्मक एवं आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करते हैं। वे संस्कृत-साहित्य के महत्त्व पर विस्तार से विचार करते हुए बताते हैं कि संस्कृत-साहित्य विस्तृत एवं विविध आयामी है। 1891 ई॰ तक कोई चालीस हजार संस्कृत-गं्रथों की नामावली तैयार हो चुकी थी। फिर भी कितने ही ग्रंथों के नाम तो उसमें शामिल ही नहीं हो पाये थे। इस विपुल साहित्य के शोध और अवगाहन के फलस्वरूप ही प्राचीन भारत का इतिहास-लेखन संभव हो सका। किन्तु यह कार्य विदेशी विद्वानों ने किया था। भारत के संस्कृज्ञ इन ग्रंथों के प्रति अगाध श्रद्धा-भक्ति रखते थे। वे देव-स्वरूप हो गये थे। वेदों को तो ईश्वरकृत माना ही जाता था, रामायण, महाभारत, पुराण तो श्रद्धेय ग्रंथ थे ही, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, श्रीहर्ष, दण्डी, बाणभट्ट आदि के ग्रंथों के प्रति भी यही भक्तिपरक अवधारणा थी। द्विवेदी जी ने इनकी ऐतिहासिकता को दृष्टि में रखकर तटस्थ विवेचन किया है और इनकी असंगतियों को भी दर्शाया है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हमारे देश में इसतरह के विचारकों का अभाव था। हिन्दी में सिर्फ पांडेय रामावतार शर्मा ही ऐसे विचारक थे जो द्विवेदी जी के समानधर्मा थे। उन्होंने लिखा है - “इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें।“


 द्विवेदी जी ने 1899 ई॰ में श्रीहर्ष के महाकाव्य ‘नैषधीयचरितम्’ पर अपनी पहली आलोचनात्मक पुस्तक लिखी - ‘नैषध-चरित-चर्चा’। यह हिन्दी में लिखी संस्कृत साहित्य पर पहली आलोचना-पुस्तक है। इसमें उन्होंने श्रीहर्ष के समय आदि का निरूपण करते हुए उनकी कविता का यथार्थ विवेचन किया है। इस विवेचन में श्रीहर्ष की काव्य-प्रतिभा का विश्लेषण करते हुए उन्होंने उनकी कमजोरियों पर भी ऊंगली रखी है। इस पुस्तक पर कई संस्कृतज्ञ विज्ञानों ने प्रत्यालोचना लिखी। इनमें प्रमुख थे - माधव प्रसाद मिश्र। ये उस समय काशी से प्रकाशित ‘सुदर्शन’ मासिक पत्रिका के संपादक थे। इन्होंने जून, 1900 ई॰ के ‘सुदर्शन’ में ‘नैषध-चरित-चर्चा’ की लम्बी समीक्षा लिखी और महावीर प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सारे आरोप लगाये। द्विवेदी जी ने उनके आरोपों के उत्तर एक लम्बा लेख लिखकर दिया, जो अक्टूबर, 1900 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। द्विवेदी जी का यह लेख संस्कृत-साहित्य के उनके गहन अध्ययन एवं संस्कृत-साहित्य के देशी-विदेशी विद्वानों के शोध-पूर्ण कार्यों का व्यौरा देने वाला है। फिर उन्होंने लगातार संस्कृत-साहित्य का अन्वेषण, विवेचन और मूल्यांकन किया। उन्होंने संस्कृत के कुछ महान् महाकाव्यों का औपन्यासिक रूप में हिन्दी में रूपान्तर भी किया, जिनमें रघुवंश, कुमार संभव, मेघदूत, किरातार्जुनीय प्रमुख हैं। श्रीहर्ष ने  ‘नैषधीय-चरितम्’ में कुछ दिक्पालों और कलियुग को पात्र बनाया है। उन्हें कलियुग के वर्णन में कई दिलचस्प प्रसंग दिखाई पड़े, जिसे उन्होंने ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में वर्णन किया है। द्विवेदी जी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग के द्वारा वैदिक रीति-रिवाज या मान्यताओं को कलियुग यानी आज के पूंजीवादी चरित्र के बरक्स खड़ा करते हैं। दोनों में वाद-विवाद, तर्क-वितर्क होते हैं। द्विवेदी जी लिखते हैं - “इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय।“ 


 द्विवेदी जी वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए ही कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना करते हैं। कलियुग के एक प्रतिनिधि के कुछ आक्षेप वैदिक देवताओं के समक्ष इस प्रकार रखे जाते हैं - “आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ?“ फिर अगला तर्क है जाति-शुद्धि एवं कुल की निष्कलंकता-विषयक। फिर उसी संदर्भ में आगे का तर्क - “स्त्री-संसर्ग को भारी पाप समझा जाता है। तुम इन्द्र को अहल्या की याद दिला देना। जिस काम में तुम्हारे राजा का इतना उत्साह उससे तुम्हारी इतनी घृणा ! तुम पूरे राज-विद्रोही हो। पीनलकोड में राज-विद्रोहियों के लिए कितनी कड़ी सज़ा का विधान है, यह बात किसी वकील से तो पूछ लेते।“ फिर अगला तर्क सुनिए - “तुम्हारे वेद कहते हैं, पाप करने से अगले जन्म में ताप और पुण्य करने से सुख होता है। पर इस जन्म में उसका उलटा प्रत्यक्ष देख पड़ता है। अगम्यागमन से सुख होता है या नहीं ? अरे, फिर क्यों प्रत्यक्ष प्रमाण को न मानकर जन्म-जन्मान्तर की न देखी हुई कपोल कल्पित बातों पर विश्वास करते हो ? इसका कहीं ठिकाना है कि मरकर फिर जन्म होगा। ..... यज्ञों में हिंसा क्यों करते हो ..... हिंसा से पाप होता है या नहीं ? वैदिक हिंसा से पाप नहीं होता, यह विचार क्या संदेह से खाली नहीं है ?“ फिर अगला आक्षेप - “जिस तरह हो सके सुख-प्राप्ति की चेष्टा करो। .... श्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन से मृत प्राणी की तृप्ति होती है - ये सब धूर्तों की बातें हैं। उनकी प्रतारणा के फंदे में पड़कर अपना सर्वनाश न करो। ... फूल को अगर तोड़ना ही है तो तोड़कर अपने सिर पर रक्खो - अपने ही ऊपर चढ़ाओ। पत्थरों पर क्यों उन्हें चढ़ाते फिरते हो ? वाह री तुम्हारी मूर्तिपूजा ! ... अरे मूर्खों, वेदों में और अधिक क्या रक्खा हुआ है ? फिर उनपर इतनी श्रद्धा क्यों ? ..... तुम लोग तो पशुओं से भी गये-बीते जान पड़ते हो, क्योंकि ब्रह्मा आदि देवताओं और व्यास आदि द्विजों के बनाये ग्रंथों पर तुम आँख मूँदकर विश्वास करते हो। उन्होंने लिख दिया है - ‘गो प्रणमेत्’ अर्थात् गाय को नमस्कार करना चाहिए। बस, तुम लगे पशुओं के सामने हाथ जोड़ने। अरे क्या तुम गाय, भैंस से भी तुच्छ हो जो किसी के कहने मात्र से उनको नमस्कार करने दौड़ते हो ? क्यों तुम व्यर्थ दान देते फिरते हो ? दान देने से लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होती .... बलि ने सर्वस्व दान देकर क्या पाया ? केवल बंधन ! क्या तुम भी यही चाहते हो ?“ इस प्रकरण के अंत में यह संदेश: इन सब ढकोसलों को छोड़ों। ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ का अंतिम प्रसंग कलियुग का निषध देश के भ्रमण का है, जहाँ वह वैदिक कर्मकाण्ड के नाम पर ऐसे-ऐसे घृणित और कुत्सित कर्म होते हुए देखता है कि उसके मन में यह विचार उठता है - यह क्रिया-काण्ड तो भाँड़ों का अकांडतांडव है। अश्वमेध-यज्ञ में, यजमान की पत्नी को, अश्व के प्रजोत्पादक अंग से, अपने अवयव-विशेष का संस्पर्श कराना पड़ता है। ... जिन वेदों में इसतरह की बातें हैं उनका कर्ता ईश्वर कदापि नहीं हो सकता। हाँ, किसी भाँड़ ने उन्हें बनाया हो सकता है।


 द्विवेदीजी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग का वर्णन कर वही अपनी पुरानी धारणा को दुहरा रहे थे - वेद ईश्वर निर्मित नहीं हैं। उनमें जो धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, यज्ञ, देवी-देवता का चित्रण है, वह मात्र ऐतिहासिक दृष्टि से जानने-समझने के लिए - आचरण करने के लिए नहीं। जो लोग सनातन-धर्म की दुहाई वेदों को लेकर किया करते हैं, उन्हें वेदों के संबंध में द्विवेदी जी के किये गये विचारों को गहराई से समझना चाहिए। उनके इस तरह के क्रांतिकारी विचारों के कारण ही उन्हें नास्तिक कहा जाता था। अपने समय के संस्कृतज्ञ विद्वानों के इस आक्षेप का उत्तर वे ‘कथऽहम् नास्तिक’ शीर्षक संस्कृत भाषा में लिखी कविता में दे चुके थे। इसी संदर्भ में उनकी ‘विधि-विडम्बना’ कविता को भी पढ़ना चाहिए। वे तथाकथित देव-वाणी ही नहीं, ईश्वर की भी आलोचना करते हैं और अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हैं। ‘विधि-विडम्बना’ कविता ‘सरस्वती’ के मई 1901 ई॰ में प्रकाशित हुई थी। यह कविता ब्रह्मा या विधाता की आलोचना बड़े ही तीखे स्वर में करती है। इसके प्रारम्भ की ये पंक्तियाँ -


अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार

क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार।


 आगे उन्होंने विधाता की विडम्बनाओं का मजाक उड़ाते हुए सृष्टि-रचना में हुई गड़बड़ियों को विनोद के लहजे में प्रस्तुत किया है -


नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं,

सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ?

घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ?

चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक।

दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है,

कुत्सित-कम्र्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है।

मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार !

तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !!

शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, 

लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार !


 इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार ! 


 द्विवेदी जी को इसीलिए नास्तिक कहा जाता था और वह भी उनके प्रांरभिक साहित्यिक जीवन के समय ही। द्विवेदी जी की कविताओं में भी एक तीखा आलोचनात्मक स्वर जगह-जगह दिखलाई पड़ता है। उनकी अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में उस समय के लेखकों का भरपूर मजाक उड़ाया गया है -


शब्द-शास्त्र है किसका नाम ?

इस झगड़े से जिसे न काम,

नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है।

इधर-उधर से जोड़-बटोर, 

लिखते हैं जो तोड़-मरोड़,

इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं।

अपनी पुस्तक की सानन्द

स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द,

अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं

निज मुख से जो गुण विस्तार

करते सदा पुकार-पुकार,

ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं।

किसी समालोचक के द्वार

सिर घिस-घिसकर बारम्बार

निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं।


 द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।

 ऐसा अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। और इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी।


 द्विवेदी जी अपने अन्य समकालीन कवियों की तरह प्रारम्भ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखते थे। जिस ब्रजभाषा में शंृगार और भक्ति की कविताओं की एक समृद्ध परम्परा रही है, उसमें उन्होंने पहले-पहल यथार्थवादी कविताएँ लिखीं। ‘भारत-दुर्भिक्ष’ (1897) एवं ‘त्राहि ! नाथ !! त्राहि !!!’ (1897) ऐसी ही कविताएँ हैं। इन कविताओं में जीवन-यथार्थ का दारुण चित्रण हुआ    है -


गली-गली कंगाल पेट पर हाथ दोऊ धरि धावैं,

अन्न अन्न पानी पानी कहि शोर प्रचण्ड मचावैं।

बालक, युवा, जरठ, नारी, नर भूख-भूख कहि गावैं,

अविरल अश्रुधार आँखिन ते बारंबार बहावैं।


 अब इस तरह के चित्रण का निराला की ‘भिक्षुक’ आदि कविताओं से मिलान कर देखिए। इसी क्रम में आगे की पंक्तियाँ -


मिलै घास भूसा नहि ढूँढ़े मूसा घर तजि भागे

रूपिया अश्व, अठन्नी महिष, बैल चवन्नी लागे।


 द्विवेजी जी की खड़ी बोली हिन्दी में लिखी पहली कविता है - ‘प्लेगस्तवराज’। यह गद्य में लिखी हुई हिन्दी की भी पहली कविता है। यह बेहद आश्चर्य का विषय है कि द्ववेदी जी खड़ी बोली हिन्दी में जो पहली कविता लिखते हैं, वह गद्य में और उसे कविता मानते हुए अपने कविता-संग्रह ‘काव्य-मंजूषा’ में स्थान भी देते हैं। इस कविता को बालमुकुन्द गुप्त ने 19 मार्च, 1900 ई॰ के ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित किया था। गुप्त जी को यह बहुत पसंद भी था। उन्होंने लिखा है - “जितने लेख आपने ‘भारत मित्र’ में लिखे उन सबमें यही हमें पसंद आया और इसी की बाहर से भी प्रशंसा हुई।“ यानी ‘प्लेगस्तवराज’ कविता को उस समय काफी ख्याति मिली थी। इस कविता का विषय तो शीर्षक से ही स्पष्ट है। अब सवाल यह उठता है कि प्लेग नामक महामारी का स्तवन क्यों किया गया ? स्तोत्र-काव्य की संस्कृत में एक लम्बी परम्परा है। स्वयं द्विवेदी जी ने स्तोत्र-काव्य लिखे थे। पर यह किस प्रकार का स्तोत्र-काव्य है ? प्लेग की महिमा एवं उसके गुणों का गान करने से भाषा में एक विशेष प्रकार की भंगिमा पैदा हो गयी है, जिसका दर्शन हिन्दी में पहली बार इस कविता में दिखलाई पड़ता है। प्लेग की स्तुति करते हुए कहीं-कहीं अंग्रेजी राज की छवि उजागर होने लगती है, वह क्या अनायास है ? ये पंक्तियाँ देखिए - “आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना  प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। .... “ (यहाँ अरबी शब्द ‘नक़ीब’ का प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है, जिसका अर्थ है - वह व्यक्ति जो किसी राजा-महाराजा की सवारी के समय आगे-आगे आवाज़ लगाते चलता है।) यह कविता संस्कृत से शुरू होती है और संस्कृत में ही समाप्त। बीच में हिन्दी रूप है। भारत में अंग्रेजीराज के स्थापित होने के बाद अकाल और महामारी पूरे हिन्दुस्तान में बहुत अधिक बढ़ गया था। इसके फलस्वरूप 19वीं शताब्दी में ही पचास लाख से अधिक भारतीय मर गये थे। द्विवेदी की ‘भारत दुर्भिक्ष,’ ‘त्राहि ! नाथ !! त्राहि !!!’ तथा ‘प्लेगस्तवराज’ कविताओं में अकालपीड़ित और महामारी ग्रस्त वैसे ही हिन्दुस्तान का यथार्थ चित्रण है। अंग्रेजी राज में सामान्य भारतीय जनता लगातार भूख और कुपोषण का शिकार हो रही थी। उसकी दरिद्रता के पीछे यह कारण था -


धड़ाधड़ धार रूपयों की बही है

विलायत ओर सीधी जा रही है


 ये पंक्तियाँ ‘स्वदेशी वस्त्र का स्वीकार’ कविता की हैं, जो ‘सरस्वती’ के जुलाई, 1903 ई॰ के अंक में प्रकाशित हुई थी। इसमें द्विवेदी जी बताते हैं कि असगर, विसेसर और काली जैसे श्रमजीवी इसलिए मर रहे हैं क्योंकि ग्राँट, ग्राहम और राली जैसे अंग्रेज अपना घर भर रहे हैं -

महा अन्याय हा हा हो रहा है !

कहें क्या कुछ नहीं जाता कहा है।

मरें असगर, विसेसर और काली,

भरे घर, ग्रांट, ग्राहम और राली।

 द्विवेदी जी की साम्राज्यवादी विरोधी चेतना यहाँ मुखर रूप में प्रकट हुई है, जबकि ‘प्लेगस्तवराज’ में यह चेतना मौन रूप में विद्यमान है।

 द्विवेदी जी ने बाल कविताएँ भी लिखी हैं। इन कविताओं की भाषा सहज और सरल है। ऐसी ही एक कविता है - ‘प्यारा वतन’। इसकी कुछ पंक्तियाँ देखें - 


 “कच्चा घर जो छोटा सा था

 पक्के महलों से अच्छा था 

 पेड़ नीम का दरवाजे पर, 

 सायबान से था वह बेहतर

 सब्ज खेत जो लहराते थे

 दिल को वे कैसे भाते थे

 फर्श मखमली जो बिछते हैं

 नहीं मुझे अच्छे लगते हैं।“


 प्रायः द्विवेदी-युग की कविताओं को इतिवृत्तात्मक कहकर विद्वानों ने चलता कर दिया है। ऐसे विद्वानों ने यह नहीं गौर किया कि ये आधुनिक युग के प्रारम्भिक चरण की कविताएँ हैं और आगे की कविता के प्रायः कई तत्त्व इनमें विद्यमान हैं। डाॅ॰ रामविलास शर्मा ने छायावादी कवियों, और खासकर निराला की कविता के वे स्रोत ढूँढ़ निकाले हैं, जो द्विवेदी जी के यहाँ मूल रूप से विद्यमान हैं। परवर्ती आलोचकों में डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव भी इस बात को स्थापित करते हुए लिखते हैं - “साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था।“


 द्विवेदी जी की कविताओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। बीसवीं शताब्दी की कविता की भित्ति इन कविताओं की नींव पर ही खड़ी हुई है। उनकी कविताओं से उनकी मनःस्थितियाँ, विचारधारा एवं भावधारा का भी पता चलता है। उन्होंने आधुनिक कविता को न केवल ब्रजभाषा से मुक्त किया, वरन् शंृगार, अलंकार, समस्यापूर्ति और नायिका-भेद की पुरानी परिपाटी को ध्वस्त कर आधुनिक कविता के निर्माण के लिए एक साफ-सुथरे यथार्थवादी एवं प्रगतिशील रास्ते का निर्माण किया।


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 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आधुनिक भावबोध की कविताएँ लिखने के साथ ही अपने वैचारिक निबन्धों के द्वारा आधुनिक युग की कविता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी। इस सन्दर्भ का उनका पहला वैचारिक निबन्ध ‘कवि-कत्र्तव्य’ जुलाई, 1901 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। वे इस निबन्ध में कविता के छन्द, भाषा, अर्थ और विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इस सन्दर्भ में उनका पहला और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है। कविता का लक्षण जहाँ कहीं पाया जाये, चाहे पद्य में, चाहे गद्य में, वहीं कविता है। फिर वे हिन्दी के कवियों से नये-नये छंदों को अपनाने का आग्रह करते हैं। जिन छंदों में पहले ही विपुल कविताएँ हो चुकीं, उनके अलावा संस्कृत और उर्दू में भी कई लोकप्रिय छंद हैं, जिन्हें हिन्दी के कवियों को अपनाना चाहिए। वे हिन्दी कवियों से तुकों के बन्धन को छोड़ने का भी आग्रह करते हैं। वे कविता की भाषा सरल, बोधगम्य और बातचीत के स्तर पर रखने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि गद्य और पद्य की भाषा भी एक ही होनी चाहिए। तात्पर्य यह कि कविता की भाषा अब ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली होनी चाहिए। वे कविता के भाव या अर्थ के संदर्भ में कहते हैं कि अर्थ-सौरस्य ही कविता का प्राण है। यदि यह है तो छंद-अलंकार के बिना भी कविता की सार्थकता है। वे कविता के दो प्रमुख उद्देश्य स्वीकार करते हैं - मनोरंजन और उपदेश। कविता में कोई न कोई संदेश अवश्य होना चाहिए, जिससे समाज को आवश्यक दिशा-निर्देश मिले एवं उसे पढ़ते हुए आनंद या मनोरंजन भी हो। ‘कवि-कत्र्तव्य’ का दूसरा भाग जनवरी, 1911 ई॰ की ‘सरस्वती’ में ‘कवि का कत्र्तव्य’ शीर्षक से ‘विद्यानाथ’ छद्मनाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें भी वे कहते हैं - “कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है।“  इस तरह वे ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत को खारिज करते हैं। फिर वे कविता को ग्रहण करने के लिए ‘सहृदय’ की बात करते हैं। हिन्दी के कवियों का उल्लेख वे इन शब्दों में करते हैं - “कवि भी ‘धर्म-संस्थापनार्थाय’ उत्पन्न होते हैं। उनका काम केवल तुक मिलाना या ‘पावस पचासा’ लिखना ही नहीं। तुलसीदास ने कवि होकर वैष्णव धम्र्म की स्थापना की है, मत-मतान्तरों का भेद मिटाया है और ‘ज्ञान के पंथ को कृपाण की धार’ बताया है। प्रायः उसी प्रकार का काम, दूसरे रूप में सूरदास, कबीर और लल्लूलाल ने किया है। हरिश्चन्द्र ने शूरता, स्वदेश-भक्ति और सत्य, प्रेम का धम्र्म चलाया है। ...... हिन्दी के जितने प्रसिद्ध कवि हैं उन्होंने देश, काल, अवस्था और पात्र के अनुसार ही कविता की है।


 दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में उनका ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध छपा। इसमें वे कविता को और गहराई से समझने का प्रयत्न करते हैं - “अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक।“ आगे वे ‘रामचरितमानस’ एवं श्रीधर पाठक के ‘एकांतवासी योगी’ की पंक्तियों का उदाहरण लेकर अपनी बातों को आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं - “अन्तःकरण में रस उत्पन्न करके, और थोड़ी देर के लिए और बातों को भुलाकर, उदार विचारों में मन को लीन कर देना ही कविता का सच्चा पर्यवसान है। कविता द्वारा यह भासित होना चाहिए कि जो बात हो गई है वह अभी हो रही है, और जो दूर है वह बहुत निकट दिखलाई देती है।“ इस लेख के अंत में वे कविता की विशेषताएँ बताते हुए कहते हैं कि कविता में विश्रांति मिलती है। वह एक प्रकार का विराम-स्थान है। उससे मनोमालिन्य दूर होता है और थकावट कम हो जाती है। चक्की पीसते समय स्त्रियाँ, काम करने में मजदूर आदि परिश्रम कम होने के लिए, गीत गाते हैं। जैसे मनुष्यों के लिए गाने की जरूरत है, वैसे ही देश के लिए कविता की जरूरत है। प्रतिदिन नये-नये गीत बनते हैं और सब कहीं गाये जाते हैं। इसी नियमानुसार देश में समय-समय पर नयी-नयी कविताएँ हुआ करती हैं।


 यहाँ द्विवेदी जी ‘नयी कविता’ का प्रयोग कर रहे हैं। तात्पर्य यह कि हर समय कविताओं में नवीनता की उद्भावना आवश्यक है। कविता में रूप और वस्तु के स्तर पर परिवर्तन होते रहता है। एक समय की कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता से नवीन होती है। यह नवीनता समय और जीवन के बदल जाने की द्योतक होती है। यहाँ आकर कविता का रूप काफी परिवर्तित हो जाता है। ‘कवि और कविता’ निबन्ध में वे बताते हैं कि कविता-प्रणाली के बिगड़ जाने पर यदि कोई नये तरह की स्वाभाविक कविता करने लगता है तो लोग उसकी निन्दा करते हैं। कुछ नासमझ और नादान आदमी कहते हैं, यह बड़ी भद्दी कविता है। कुछ कहते हैं यह कविता ही नहीं है। कुछ कहते हैं कि यह कविता तो ‘छन्दोदिवाकर’ में दिये गये लक्षणों से च्युत है, अतएव यह निर्दोष नहीं। बात यह है कि जिसे अब तक कविता कहते आये हैं, वहीं उनकी समझ में कविता है और सब कोरी काँव-काँव ! इसी लेख में आगे वे स्थापित करते हैं कि कविता और पद्य में अन्तर होता है। “किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। “जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना अधिक ज्ञान होता है वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।


 द्विवेदी जी ने ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध में यह उल्लेख किया है कि देश में जैसे-जैसे सुधार अधिक होता है और विद्या-बुद्धि बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे कविता-शक्ति कम होती जाती है। रामचन्द्र शुक्ल ने इस बात को कुछ शब्द बदल कर रखा है कि सभ्यता के विकास के साथ कवि-कर्म मुश्किल होता जाता है। परन्तु द्विवेदी जी ने आगे चलकर इस मत का संशोधन किया है। उन्होंने कविता पर सबसे महत्त्वपूर्ण विचार ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में प्रस्तुत किया है, जो सितम्बर, 1920 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ था। इस निबन्ध में भारतीय एवं यूरोपीय कविता की परम्परा का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि जीवन की किन परिस्थितियों में एक खास प्रकार की कविता का जन्म होता है। समय के परिवर्तन के साथ कविता के भावों, विचारों और ढाँचों में भी अन्तर होता जाता है। भाषा की उन्नति के साथ-साथ कविता की भी उन्नत्ति होती है। विज्ञान के विकास से कला का ह्रास नहीं, प्रत्युत वृद्धि होती है। परन्तु कविता का सत्य विज्ञान या दर्शन का सत्य नहीं है और न उसमें वह सत्य है, जो किसी धर्म या मत विशेष से स्पष्ट किया जाता है। इसमें सत्य का प्रकाश कुछ दूसरी ही रीति से होता है। 


 पहले द्विवेदी जी मानते थे कि कविता का उद्देश्य मनोरंजन और शिक्षा देना है। परन्तु इस निबन्ध में वे अपने पुराने मत का संशोधन करते हुए कहते हैं, “कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।“ यहाँ द्विवेदी जी मानो भावी स्वच्छंदतावादी या छायावादी कविता की पृष्ठभूमि तैयार करते-से लगते हैं। इस निबन्ध के अंत में वे भावी कविता के स्वरूप पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि जब भावों की वृद्धि होती है तब भाषा में रूपान्तर होता है। जब कोई भाषा भाव ग्रहण करने में असमर्थ होती है, तब उसका अन्त हो जाता है और उसका आसन दूसरी भाषा ले लेती है। यही कारण है कि भाषा एक-सी कभी नहीं रहती। 


 यहाँ द्विवेदी जी का आशय भाषा के स्वरूप से है। यानी हर युग की कविता एक नये प्रकार का शब्द-विन्यास, एक नयी अभिव्यंजना या सर्जना, अन्ततः एक नयी भाषा लेकर प्रकट होती है। “प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शंृगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का।“ यह है कविता की प्राचीन परम्परा। इसके बाद कविता के भावी स्वरूप पर वे प्रकाश डालते हैं। “बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स$अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है।“ यह है छायावादी कविता की विशेषता, जो उस वक्त शुरू ही हुई थी। 


 इस निबन्ध के अंत में भावी यथार्थवादी एवं प्रगतिशील कविता का सौंदर्यशास्त्र प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं - “अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा।“ यहाँ द्विवेदी जी ने ‘साधारण के सौंदर्य’ के उद्घाटन की जो बात कही है, वह उनके समय से बहुत आगे की बात है। द्विवेदी जी की इस स्थापना का श्रोत स्वयं उनका जीवन है। वे जहाँ एक ओर अपने समय में अपने विचारों के द्वारा एक युगान्तर उपस्थित कर हिन्दी भाषी क्षेत्र की जनता में नवजागरण की शुरुआत कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर किसानों के जीवन से घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए थे। ‘सरस्वती’ के सम्पादन से अवकाश लेने के बाद उन्होंने अपने इलाके में ग्राम-पंचायत की स्थापना की थी और उसके सरपंच के रूप में किसानों की समस्याओं से गहराई से जुड़े रहे।

 ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में जो स्थापना द्विवेदी जी ने की है, उसी को रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में शब्द बदल कर रखा है। द्विवेदी जी के शब्द हैं - “क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं।“ अब रामचन्द्र शुक्ल के शब्द देखें - “देश में मुसलमानों का राज्य स्थापित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव-गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। ... इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिन्दू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करूणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?“ हालाँकि इस स्थापना का खण्डन कई इतिहासकार कर चुके हैं। पर यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह स्थापना द्विवेदी 1920 में कर रहे थे, जिसे 1929 के इतिहास में शुक्ल जी दुहरा रहे थे।


 द्विवेदी जी के बहुत सारे विचार और काम आज भले ही अप्रासंगिक लग सकते हैं, परन्तु उनके समय में वे कितने क्रांतिकारी थे, यह हिन्दी साहित्य के इतिहास में गहरे उतरने वाले ही समझ सकते हैं। उनका एक प्रारम्भिक निबन्ध है -‘नायिका भेद’, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था। इसमें वे बताते हैं, “राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं।“ 


 द्विवेदी जी के समय की कविता की एक स्थिति तो यह थी, दूसरी समस्यापूर्ति की थी। उनके समय में ही उर्दू वालों की नकल पर कवि-सम्मेलनों की शुरुआत हो चुकी थी, जिससे कविता की पतनशीलता और बढ़ गयी। जनवरी, 1926 ई॰ में कविकिंकर नाम से महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक एक लेख लिखा। इसके प्रारम्भ में वे महान् कवियों की विशेषता बताते हुए कहते हैं, “प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है।“ लेकिन इसके उलट बहुत सारे या बहुतायत में कवि थे जो समस्यापूर्ति, नायिका-भेद एवं शंृगारिकता की धारा बहा रहे थे और ऐसी कविताएँ कवि-सम्मेलनों का आधार थीं। द्विवेदी जी कहते हैं, “अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है।“ 


 इन कवि-सम्मेलनों में एक प्रवृत्ति और जोर मारती हुए फिर से दिखाई पड़ने लगी थी और वह थी ब्रजभाषा की रीतिवादी कविता की पुनस्र्थापना। वे इस पर प्रहार करते हुए कहते है, “ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।“


 द्विवेदी जी के समय में ही कवियों में दलबन्दी शुरू हो गयी थी। ऐसे कवियों पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं, “कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े।“ फिर वे भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, “दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ?“ आज हिन्दी के साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में दलबन्दी की स्थिति चरम पर है। क्या इससे साहित्य और देश का भला हो सकता है ? मई, 1927 ई॰ की ‘सरस्वती’ में द्विवेदी जी का ‘आजकल के हिन्दी-कवि और कविता’ शीर्षक प्रसिद्ध निबन्ध सुकविकिंकर छद्म नाम से छपा था, जिसमें छायावाद के नाम से प्रचलित रहस्यवादी, नकली एवं छद्म कविता की आलोचना है।


साभार भारत यायावर  सर

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