बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

प्रेम? / ओशो

 बहुत समय पहले, च्वांग्त्सु नाम का एक विचारक हुआ। एक रात्रि में, एक झोपड़े के पास निकलता था। उसके भीतर..एक प्रेमी और प्रेयसी की बातें चलती थीं, उनको झोपड़े के बाहर से अचानक सुन लिया। वह प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी कि तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी नहीं जी सकती हूं। तुम्हारा होना ही मेरा जीवन है। च्वांग्त्सु मन में सोचने लगा, किसी का जीवन किसी दूसरे के होने में कैसे हो सकता है? अगर मैं आपसे कहूं कि आपके होने में ही मेरा जीवन है, और अगर मेरा कोई जीवन होगा तो वह छाया का जीवन होगा कि क्योंकि आपके होने में मेरा जीवन कैसे हो सकता है? जो लोग भी अपने जीवन को किसी और में रख देते हैं, वे लोग छाया का जीवन जीते हैं..चाहे धन में, चाहे यश में, चाहे मित्रों में, चाहे प्रियजनों में। जो दूसरों में अपने जीवन को रख देता है उसका खुद का जीवन छाया का जीवन हो जाता है। उसका जीवन वास्तविक नहीं हो सकता। उसका जीवन झूठा होगा। जैसे कोई वृक्ष कहे किसी दूसरे वृक्ष से कि तुम्हारी जड़ें ही मेरी जड़ें हैं और अपनी जड़ों को भूल जाए, तो यह वृक्ष थोड़े ही दिनों में कुम्हला जाएगा, मुर्झा जाएगा और सूख जाएगा। क्योंकि दूसरे की जड़ें दूसरे की ही होंगी, इस वृक्ष की नहीं हो सकेंगी। च्वांग्त्सु ने लौट कर अपने शिष्यों को कहा कि आज मैंने एक अदभुत सत्य अचानक सुन लिया है। एक प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी, तुम्हारे होने में मेरा जीवन है। जहां-जहां कोई व्यक्ति यह कहता हो कि फलां चीज के होने में मेरा जीवन है, वहीं जानना कि जीवन असत्य है और झूठा है। जीवन अपने होने में होता है, किसी और के होने में संभव नहीं है।


फिर और भी आश्चर्यजनक बात घटी..कुछ समय बीत जाने के बाद च्वांग्त्से एक पहाड़ के करीब से गुजरता था और उसने एक स्त्री को एक कब्र के पास बैठे हुए देखा। यह तो कोई अनहोनी बात न थी।


च्वांग्त्सु ने जाकर पूछा कि बात क्या है? उस स्त्री ने कहाः मेरे पति को मरे दो ही दिन हुए और मुझे एक नये प्रेमी के प्रेम में पड़ जाना हो गया है। तो कम से कम पति की कब्र सूख जाए, उतनी देर तक रुकना जरूरी है। इसलिए कब्र को सुखा रहे हैं। च्वांग्त्सु वापस लौटा, उसने अपने शिष्यों से कहाः आज एक और नये सत्य का अनुभव हुआ। जो लोग कहते हैं, तुम्हारे बिना न जी सकेंगे, वे तुम्हारे मरने के बाद तत्क्षण अपने जीने के लिए कोई और कारण खोज लेंगे, कोई और उपाय खोज लेंगे। अभी एक स्त्री अपने पति की कब्र को पंखा कर रही थी, क्योंकि कब्र जल्दी सूख जाए ताकि वह नये प्रेम की दुनिया में प्रवेश कर सके।


जो जीवन दूसरों पर जीता है वह उनके हट जाने पर तत्क्षण दूसरे मुद्दे, दूसरे कारण खोज लेगा। और यह भी स्मरण रखें कि ऐसा जीवन प्रतिक्षण बदलता हुआ जीवन होगा, क्योंकि छाया का जीवन स्थिर जीवन नहीं हो सकता। आप जहां जाते हैं वहां आपकी छाया चली जाती है। सुबह, मैंने सुना है, एक चींटी अपने छेद से बाहर निकली, उसने देखा, सूरज उग रहा है, उसकी बड़ी लंबी छाया बन रही है।


उसने कहाः आज तो मुझे बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी। बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि छाया उसकी बड़ी थी और उसने सोचा, इतनी बड़ी मेरी देह है आज मुझे भोजन की जरूरत पड़ेगी। दोपहर तक वह भोजन खोजती रही, तब तक सूरज ऊपर चढ़ गया, छाया छोटी हो गई। दोपहर उसने सोचा था, आज थोड़ा सा भी मिल जाए तो भी काम चल जाएगा। जो छाया सुबह बड़ी थी, वह दोपहर सिकुड़ कर छोटी हो गई। जो छाया बहुत बड़ी बनती थी, अंधकार में बिल्कुल नहीं बनेगी।

ओशो

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...