बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

टिहरी की कहानी राकेश मोहन थपलियाल की जुबानी

 बरसों के बाद भी मेरा याराँ उदास था. 

उस शहर में यारां बता, ऐसा क्या खास था ?


पीरों के घर थे या के फकीरों का वास था 

यारां मेरे मुझको बता, ऐसा क्या खास था ?


मजनू का आशियाँ था या लैला –निवास था, 

उस शहर में यारां बता ,ऐसा क्या खास था ?


पुरखों की अस्थियाँ थी या माँ –बाप थे दफ़न,  

यारां मेरे मुझको बता, ऐसा क्या खास था ?


यारों के काफिले थे या यादों के सिलसिले,

होली के रंग थे कि दिवाली के थे दिए ?


किसके मजार पर था वो जलता हुआ दिया,

आंधी ने जिसको वक्त से पहले बुझा दिया ?  

  

यारां मेरे मुझको बता, ऐसा क्या खास था ?

जिसके लिए यारां मेरा अब भी उदास था ,


गम के थे ताजिये या मोहोब्बत की ईद थी,

मंदिर की घंटियाँ थी या जीसस की सलीब थी ?


यारां मेरे सच –सच बता, ऐसा क्या खास था ?


जीने का फलसफा अलग, मजहब अलग- अलग,

मरने के  बाद  लेकिन क्यों सब एकसाथ  थे ?


गंगा के घाट पे कई मुस्लिम भी थे खड़े थे ,

कबरों के पास खड़ा कोई  हिन्दू उदास था ? 

     

तो सुन मेरे यारा तुझे, उसका सुनाउँ हाल,

छोटा सा शहर था मगर था  बहुत बेमिसाल ?


गंगा –भिलंगना,शहर में बहती थी दो नदियाँ,

राजाओं  के महल  थे और बद्री- विशाल थे ?


गंगा का भी मंदिर था और बाबा –केदार थे ,

काली के पास साथ  ही शिव नर्मदेश्वर थे ?


लक्ष्मी -नारायण थे वहां ,रघुनाथजी  भी थे ,

और उनके साथ -साथ ही हनुमानजी भी थे ?


इस तरफ थी अजान और उस तरफ थी अरदास ,

गीताभवन भी शहर का होता था बड़ा खास ?


उस शहर के घंटाघर का कोई न था सानी,

 उस शहर की सिंगोरिया और नथ प्रशिद्ध थी ,


उस शहर में आकर रहे  वेदांती स्वामी रामतीर्थ ,

उस शहर से जुड़ा था श्रीदेव सुमनजी का नाम  ? 


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 अब मेरे भाई तुम्ही बताओ,क्या कोई ऐसा दूसरा शहर  है उत्तराखंड में ?

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